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सूरज सफ़र में है तेरी यादों के साथ साथ

बेघर हुए हैं ख़्वाब धमाकों के साथ साथ।

वहशत भी ज़िंदा रहती है साँसों के साथ साथ॥

 

जब रौशनी से दूर हूँ कैसी शिकायतें,

अब उम्र कट रही है अँधेरों के साथ साथ॥

 

दरिया को कैसे पार करेगा वो एक शख़्स,

जिसने सफ़र किया है किनारों के साथ साथ॥

 

वीरान शहर हो गया जब से गया है तू,

हालांकि रह रहा हूँ हजारों के साथ साथ॥

 

पत्ता शजर से टूट के दरिया पे जो गिरा,

आवारा वो भी हो गया मौजों के साथ साथ॥

 

मुद्दत हुई की नींद चुरा ले गया कोई,

कटती है अब तो रात सितारों के साथ साथ॥

 

इस जीस्त के सफ़र में भी तन्हा नहीं रहा,

“सूरज” सफ़र में है तेरी यादों के साथ साथ॥

 

डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

मौलिक और अप्रकाशित 

Views: 770

Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 27, 2013 at 4:54pm

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही है आ० डॉ० सूर्या बाली जी 

हर शेर रोक रहा है.....

ये शेर तो ख़ास पसंद आया ..

दरिया को कैसे पार करेगा वो एक शख़्स,

जिसने सफ़र किया है किनारों के साथ साथ॥

हार्दिक शुभकामनाएं 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 27, 2013 at 3:53pm

एक और मिसाल गढ़ती हुई ग़ज़ल सामने है, डॉक्टर साहब. बहुत खूब !

इन दो अश’आर के लिए बार-बार वाह वाह -

दरिया को कैसे पार करेगा वो एक शख़्स,
जिसने सफ़र किया है किनारों के साथ साथ॥

पत्ता शजर से टूट के दरिया पे जो गिरा,
आवारा वो भी हो गया मौजों के साथ साथ॥

दिल खुश होगया, भाई साहब.

एक अनुरोध -

आप ग़ज़ल के साथ उसके मिसरों के वज़्न भी दे दिया करें जो कि ओबीओ पर की परिपाटी है. सीखने वालों को सहुलियत होती है.

जैसे आपकी इस ग़ज़ल के मिसरों का वज़्न २२१ २१२१ १२२१ २१२ है.

सादर

Comment by विजय मिश्र on November 26, 2013 at 5:26pm
"दरिया को कैसे पार करेगा वो एक शख़्स,
जिसने सफ़र किया है किनारों के साथ साथ॥"
और ये
"पत्ता शजर से टूट के दरिया पे जो गिरा,
आवारा वो भी हो गया मौजों के साथ साथ॥" --- हर्टटचिंग लाइन्स ,मन को मना गयीं |बधाई प्राप्त करें सुंदर प्रस्तुति हेतु |
Comment by Meena Pathak on November 26, 2013 at 2:27pm

बहुत सुन्दर गज़ल, बहुत बहुत बधाई आप को आदरणीय | सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 26, 2013 at 2:20pm

दरिया को कैसे पर करेगा वो एक शख़्स,

जिसने सफ़र किया है किनारों के साथ साथ..गहन चिंतन से लबरेज अनुभव की बात ..एक सन्देश के रूप में 

पत्ता शजर से टूट के दरिया पे जो गिरा,
आवारा वो भी हो गया मौजों के साथ साथ....बहुत ही बढ़िया ..............मेरी तरफ से आपको हार्दिक बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 25, 2013 at 10:19am
आदरणीय डा. बाली भाई , लाजवाब गज़ल कही है , हर शे र उम्दा हैं !!!
वीरान शहर हो गया जब से गया है तू,
हालांकि रह रहा हूँ हजारों के साथ साथ॥

पत्ता शजर से टूट के दरिया पे जो गिरा,
आवारा वो भी हो गया मौजों के साथ साथ॥ -- आदरणीय ढेरों बधाई कुबूल करें !!!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 25, 2013 at 7:34am

//पत्ता शजर से टूट के दरिया पे जो गिरा,

आवारा वो भी हो गया मौजों के साथ साथ//

वाह बेहतरीन शेर है आदरणीय डॉ बाली साहब दाद कुबूल करें

Comment by नादिर ख़ान on November 24, 2013 at 11:13pm

इस जीस्त के सफ़र में भी तन्हा नहीं रहा,

“सूरज” सफ़र में है तेरी यादों के साथ साथ॥

आदरणीय सूर्या बाली जी, हमेशा  की तरह फिर एक बार लाजवाब प्रस्तुति ...

आपकी गजलें  ओ बी ओ में सूरज की तरह चमकती है । बहुत बधाई आपको ।

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on November 24, 2013 at 7:34pm

आ. सूर्य बाली भाई खूबसूरत गज़ल हुई है , हार्दिक बधाई ॥

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on November 24, 2013 at 7:19pm

आदरणीय खूबसूरत शेर के लिये बधाइयाँ
दरिया को कैसे पर करेगा वो एक शख़्सए
जिसने सफ़र किया है किनारों के साथ साथ॥

कृपया ध्यान दे...

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