१२२२ १२२२ १२२२ १२२२
जो भूखा रो रहा उसको नही रोटी खिलाते हैं
जो बुत हैं मौन मंदिर में उन्हें सब सर झुकाते हैं
जिकर होता है जिसका दोस्तों हर सांस में मेरी
मेरे दुश्मन का लेके नाम वो मेंहदी रचाते है
जहाँ भी चाहते दिल फेंकते आदत है ये उनकी
नजर जब हमसे मिलती है तो वो कितना लजाते हैं
सजाये थे गुलाबी पांखुरी से पथ मगर अब क्या
जो पल्लू झाड़ियों में खुद ही अब उलझाये जाते हैं
गुलाबों की भी किस्मत आशु तुमसे कितनी अच्छी है
हसी के हाथ चूमे और फिर गेसू सजाते हैं
मौलिक व अप्रकाशित
Comment
आदरणीय भुवन जी. हौसला अफजाई के लिए तहे दिल धन्यवाद सादर
आदरणीय लक्ष्मण जी ..ह्रदय से आभारी हूँ ..यूं ही स्नेह बनाये रखें सादर
जिकर होता है जिसका दोस्तों हर सांस में मेरी
मेरे दुश्मन का लेके नाम वो मेंहदी रचाते है
वाह बहुत बढ़िया ग़ज़ल आदरणीय
बहुत खूब ! गजल बधाई ।
आदरणीय आशुतोष जी बढ़िया ग़ज़ल कही है बहुत बहुत बधाई आपको
गुलाबों की भी किस्मत आशु तुमसे कितनी अच्छी है
हसी के हाथ चूमे और फिर गेसू सजाते हैं.....बहुत खूब.
काफी खूबसूरत अश'आर बधाइयाँ कबूलें
आदरणीय भाई आशुतोष जी क्या खूब ग़ज़ल कही है हर शेर पर दाद कबूल करें ..
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