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ग़ज़ल - कचरों को दबाया जा रहा है ( गिरिराज भन्डारी )

2122     2122     2122     2122

चद्दरों से, सिर्फ़ कचरों को दबाया जा रहा है

साफ सुथरा इस तरह खुद को जताया जा रहा है

 

लूट के लंगोट भी बाज़ार में नंग़ा किये थे

फिर वही लंगोट दे हमको मनाया जा रहा है

 

रोशनी सूरज की सहनी जब हुई मुश्किल उन्हें तो  

देखिये राहू से मिल सूरज छिपाया जा रहा है

 

सभ्यता जिस देश की माँ-बाप की पूजा, वहाँ पर

माँ-पिता के नाम पर अब दिन मनाया जा रहा है

 

ज़िन्दगी क्या मौत क्या हम मुफ़लिसों के वास्ते, अब

क्या बतायें किस तरह खुद को बचाया जा रहा है

 

जिस हक़ीकत को समझ के लोग दानिश मन्द होते

उस हक़ीकत को किताबों से हटाया जा रहा है

मामले वे, पर्वतों से भी अटल लगते हैं उनको

बस बयानी फूँक से देखो उड़ाया जा रहा है

*************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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Comment by SALIM RAZA REWA on April 6, 2014 at 9:25pm

bhai sahab ..

sabhi sher nayapan lie hue hai gazal ke lie mubarakbad....


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 6, 2014 at 8:55pm

आदरणीय शिज्जू भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 6, 2014 at 5:55pm

बहुत बढ़िया आदरणीय गिरिराज सर बेहतरीन अशआर से सजी ग़ज़ल है एक के बाद एक कटु सत्य को सामने लाती दिली दाद कुबूल करें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 6, 2014 at 12:51pm

आदरणीया कुंती जी , आपकी उपस्थिति और सराहना ने ग़ज़ल का मान बढा  दिया !! आपका तहे दिल से शुक्रिया  ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 6, 2014 at 12:49pm

आदरणीय नादिर खान भाई , गज़ल की तारीफ कर उत्साह वर्धन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥ आपने सही कहा है , वहाँ पर छुपाया शब्द सटीक है , पर मुझे छुपाया को सूरज वाले शेर के लिये बचा के रखना चाहता था , जहाँ दबाया शब्द ठीक नही लगता ॥ और मुझे इता दोष का ख़तरा भी लगा ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 6, 2014 at 12:45pm

आदरणीया कल्पना जी , गज़ल की सराहना और उत्साह वर्धन के लिये आपका दिली आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 6, 2014 at 12:44pm

आदरनीय चन्द्र शेखर भाई , ग़ज़ल की सराहना के लिये आपका आभार ॥

Comment by coontee mukerji on April 6, 2014 at 12:38pm

चद्दरों से, सिर्फ़ कचरों को दबाया जा रहा है

साफ सुथरा इस तरह खुद को जताया जा रहा है.....खूब पहचाने.

सभ्यता जिस देश की माँ-बाप की पूजा, वहाँ पर

माँ-पिता के नाम पर अब दिन मनाया जा रहा है.....यही तो देश का दुर्भाग्य है.

ज़िन्दगी क्या मौत क्या हम मुफ़लिसों के वास्ते, अब

क्या बतायें किस तरह खुद को बचाया जा रहा है.....बहुत खूब.

 

 

Comment by नादिर ख़ान on April 6, 2014 at 11:56am

आदरणीय गिरिराज़ जी उम्दा गज़ल के लिए बहुत बधाई बहुत ही सार्थक गज़ल हुयी है 

मतला भी लाजवाब है ।

मतले के शेर को को अगर  इस प्रकार किया जाए ....

चादरों से अपने कचरे को छुपाया जा रहा है

साफ सुथरा इस तरह खुद को दिखाया जा रहा है

(बस जेहन में आया तो लिख दिया गुस्ताखी माफ ...)

 

Comment by कल्पना रामानी on April 5, 2014 at 9:53pm

सभ्यता जिस देश की माँ-बाप की पूजा, वहाँ पर

माँ-पिता के नाम पर अब दिन मनाया जा रहा है...सच है लेकिन यह भी है कि अब दिन भी वरिष्ठ जन ही आपस में मनाने लगे हैं। 

सुंदर गज़ल के लिए आपको हार्दिक बधाई आदरणीय गिरिराज जी 

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