For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

छाँह में छिपना चाहता हूँ ..... (विजय निकोर)

 छाँह में छिपना चाहता हूँ ...

 

तुम कहते हो मैं भी

चाँद की चाँदनी को पी लूँ ?

कल  हर भूखे का

भोजन निश्चित है क्या ?

 

आशा-अनाशा की उलझी

परस्पर लड़ती हुई हवाएँ

गम्भीर वास्तविकताएँ

दिन के उजाले में मन से ओझल

मध्य-रात्रि के सूने में तहों के नीचे से

उद्दीप्त, प्रकाशबिम्ब-सी

 

संकेतक हैं जीवन के लक्ष्य की

पर अधूरी-सतही ज़िन्दगी का

कोई खोखला हिस्सा

वस्तुत: असम्भव-सा

बदलता नहीं

अन्दर गहरे कुछ बदलता नहीं

 

अपने ही खयालों की भयानक

प्रतिध्वनि सुनकर

भीतर मेरे अपने से कुछ

गिर जाता है  हर रात

अंधेरे में खयालों के कगारों से

तैरती-उतरती चली आती

जन-समस्याएँ

दिशा-दिशा से मानव की

असहय पीड़ा की आवाज़ें

 

सड़क पर भीख मांगते भूखे-नंगे बच्चे

जीर्ण शरीरों पर गरम लोहे के निशान

मात्र एक रोटी के लिए उनकी

दर्द भरी करूणामय पुकार

माथे पर जो रखा हाथ

उन्हें था कब से बुखार

 

कहीं किसी ससुराल में सिसकती

किसी की बेटी की आँखों में

हृदय विदारक आँसू

गरीब माँ की तड़प

बेटी की खुशी के लिए

मंगल सूत्र भी बेच चुकी है

 

उदास गरीब बाप बेचारा

सड़क के कोने पर खड़ा

रेड़ी पर थोड़े-से केले बेच रहा

घर में बेटे की लाश

ज़िन्दगी में कभी बच्चे को

नया कपड़ा दे न सका

कफ़न की चादर के लिए

आज चाहिए उसे कुछ पैसे

 

यह टप-टप टपकती गहरी

मानव की मानव के प्रति बढ़ती

अग्निमय असंवेदनशीलता

अन्य की पीड़ा निगाहों से ओझल

गरीबों के कंधों पर अमीरों का भार

इतनी प्रश्न-मुद्राएँ ...

मेरी आँखों का भ्रम ? नहीं, नहीं, नहीं

आर-पार फैली है अधूरी सतही मानवता

 

तुम कैसे कहते हो मैं भी

चाँद की चाँदनी को पी लूँ

दोस्त, मैं मानव कहलाने से लजाता

आज अपनी छाँह में छिपना चाहता हूँ

 

                 --------

                                   -- विजय निकोर

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

 

 

 

 

 

 

Views: 792

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by narendrasinh chauhan on April 28, 2017 at 6:07pm

दिल को छू लेने वाली रचना 

Comment by vijay nikore on May 16, 2014 at 8:16am

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय भाई लक्ष्मण जी।

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 10, 2014 at 6:53pm

दोस्त, मैं मानव कहलाने से लजाता

आज अपनी छाँह में छिपना चाहता हूँ  -----जब मानव में इंसानियत की जगह पशुता जन्म ले रही हो, तब आदमी को आदमी कहलाने में भी लाज आना स्वाभविक है |  सुन्दर और सार्थक रचना हुई है | हार्दिक बधाई श्री विजय निकोरे जी 

Comment by Vindu Babu on May 10, 2014 at 5:42am

  इस सार्थक विमर्श के लिए मेरी उत्सुकता और सम्वेदना सादर निवेदित है आदरणीय।

और यथा/बचकाना अनुभव भी।

।इस महत्वपूर्ण सामाजिक विषय पर आपके आलेख की सादर प्रतीक्षा है...

सादर...शुभ शुभ

Comment by vijay nikore on May 8, 2014 at 11:06am

//ओह ! मानव का समाज मानव के लिए कितना असंवेदनशील होता है !//

रचना के मर्म को आदर देने  के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय सौरभ जी।

Comment by vijay nikore on May 8, 2014 at 11:00am

आपने कहा.....

 

//आपकी इस अभिव्यक्ति को पढ़कर आँखे भर आईं,//

//क्या इस तरह के(जैसी आपकी यह कविता) अति संवेदनशील साहित्य को पढ़कर/लिखकर हम अपने अन्दर उस सम्वेदना को जी पा रहे हैं,जिसकी आवश्यकता वास्तव में 'इस' समाज(जिसका वर्णन आपने कविता में किया है) को है,यदि जी पा रहे हैं तो वो क्षणिक तो नहीं...जीकर फिर उसका क्रियान्वयन कर पा रहें हैं....इन विन्दुओं पर थोड़ा सा विचार करने की आवश्यकता है.//


आदरणीया विन्दु जी: आपने समाज के नाम पर हम सभी के लिए अति-सूक्षम प्रश्न दिए हैं, कयूँकि समाज हम सभी ही हैं। समाज में कितने लोग आँख मीच कर चलते हैं, कुछ आँख खोल कर चलते हैं परन्तु सीधी सड़क पर.. दायं-बांयं देखे बिना, और कुछ एक किसी की कठिनाई को देख कर रूक जाते हैं और वास्तव में शब्दों के पार जा कर असली सहायता करते हैं। यह सभी ठीक हैं, क्यूंकि हर किसी को अपने जीने का महत्व स्वयं और स्वयं के लिए परिभाषित करना है। इस प्रकार हम सभी अपनी आत्मा की आवाज़ सुनने के लिए एकाकी हैं।

 

अब आपके दूसरे प्रश्न का उत्तर : यदि किसी के मन में इस रचना को पढ़ कर संवेदना उमड़ेगी तो वह क्षणिक् ही होगी, हाँ, यदि मानव की मानव के प्रति संवेदना पहले से ही होगी तो ऐसी सच्चाई से पूर्ण रचना उसको किसी के लिए कुछ करने को प्रेरित कर सकती है। आपके इन अच्छे प्रश्नों पर अलग से आलेख के द्वारा विमर्ष हो सकता है, परन्तु उसके लिए भी एक विशेष उत्सुक्ता चाहिए, विशेष संवेदना चाहिए।

 

आपने पहनी नज़र से इस कविता को देखा, आपका हार्दिक आभार, आदरणीया विन्दु जी।

 

इन बिन्दुओं पर आपके अपने विचार, और विचारों से अधिक आपके निजी अनुभव जानने की जिज्ञासा रहेगी आदरणीया।

 

सादर।

Comment by vijay nikore on May 8, 2014 at 10:30am

 

//दिल भर आया आपकी अभिव्यक्ति पढ़ .....किस कदर अपने दर्द महसूस किया और उसे शब्दों में उकेरा...... निःशब्द हो गयी हूँ .//


आदारणीया प्रियंका जी, किसी भी कवि की कृति पाठक को इस प्रकार ठहरा ले, संवेदना उकेरे, तो कवि के लिए यह पारितोषिक से कम नहीं है। आपका हार्दिक आभार  आदरणीया ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 2, 2014 at 1:44am

ओह ! मानव का समाज मानव के लिए कितना असंवेदनशील होता है !

सादर बधाई आदरणीय

Comment by vijay nikore on April 29, 2014 at 4:16pm

//यथार्थ की असीम  गहराई को अपनी रचना में आपने बयां किया. यह आपकी अनुभवी लेखनी का ही कमाल है//

इन शब्दों से आपने इस रचना को बहुत मान दिया है। आपका हार्दिक आभार, आदरणीय जितेन्द्र जी।

Comment by vijay nikore on April 28, 2014 at 12:30pm

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीया कल्पना जी।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

pratibha pande replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"आदरणीय मिथिलेश जी के कहे से मैं भी सहमत हूँ। कैलेंडर प्रथम सप्ताह में आ जाय और हफ्ते बाद सभी आयोजन…"
17 hours ago
Dayaram Methani replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"सभी आदरणीय को नमस्कार। आदरणीय तिलक राज कपूर जी का ये उत्तम विचार है। अगर इसमें कुछ परेशानी हो तो एक…"
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . .युद्ध

दोहा सप्तक. . . . . युद्धहरदम होता युद्ध का, विध्वंसक परिणाम ।बेबस जनता भोगती ,  इसका हर  अंजाम…See More
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"इस सारी चर्चा के बीच कुछ बिन्दु और उभरते हैं कि पूरे महीने सभी आयोजन अगर ओपन रहेंगे तो…"
yesterday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"आदरणीय, नमस्कार  यह नव प्रयोग अवश्य सफलता पूर्वक फलीभूत होगा ऐसा मेरा विश्वास है तथा हमें…"
Thursday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"सुझाव सुन्दर हैं ।इससे भागीदारी भी बढ़गी और नवीनता भी आएगी । "
Thursday

मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi" replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
" कृपया और भी सदस्य अपना मंतव्य दें ।"
Wednesday
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"तरही का मुख्य उद्देश्य अभ्यास तक सीमित है, इस दृष्टि से और बहरों पर भी तरही मिसरे देना कठिन न होगा…"
Wednesday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . घूस

दोहा सप्तक. . . . . घूस बिना कमीशन आजकल, कब होता है काम । कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।। घास…See More
Tuesday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"सादर नमस्कार। मुझे ऐसी ही एक चर्चा की अपेक्षा थी। आवश्यकता महसूस हो रही थी। हार्दिक धन्यवाद और…"
Tuesday

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के सभी सम्मानित सदस्यों को सादर नमस्कार। आदरणीय तिलक राज कपूर सर द्वारा…"
Tuesday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"सभी आदरणीय सदस्यों को नमस्कार, एक महत्वपूर्ण चर्चा को आरम्भ करने के लिए प्रबन्धन समिति बधाई की…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service