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आदमी (प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा )

आदमी 
---------------
ऊँची ऊँची अट्टालिकाएं
बौने लोग
विकृति और स्वभाव
एक दूजे के
पर्यायवाची

चाहरदीवारी के मध्य
शून्य
वर्जनाओं के टूटने का
उदघोष
खामोशी से सुनते हुए
ध्वनि प्रतिध्वनि
संज्ञा शून्य

आहत भावनाये
रिसता खून
अँगुलियों से चाटते हुए
शायद
ये भी नमकीन है
अपनों के लहू जैसा

प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा
मौलिक /अप्रकाशित
२०.०४.२०१४

Views: 1265

Comment

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Comment by Savitri Rathore on May 8, 2014 at 11:28pm

आ ० प्रदीप सर, सादर नमस्कार !
इतनी सटीक और यथार्थवादी रचना हेतु बधाई !

Comment by MAHIMA SHREE on May 8, 2014 at 8:42pm

आदरणीय प्रदीप सर , नमस्कार

बहुत ख़ुशी हुयी देख आपकी रचना को महीने की सर्वश्रेठ रचना के सम्मान से नवाज़ा गया है .. बहुत -२ हार्दिक बधाई और शुभकामनायें ...सादर

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on May 8, 2014 at 6:42pm

बहुत सुंदर रचना आदरणीय प्रदीप कुशवाहा जी !!

Comment by Meena Pathak on May 7, 2014 at 11:20pm

बहुत ही सुन्दर रचना .. बधाई आप को | सादर 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 6, 2014 at 12:48pm

आदरणीय सिंह साहब जी 

सादर 

आप ही तों हैं जो सब जानते हैं 

कैसा भी हो समय मेरा पहचानते हैं 

आपका भी अभिनंदन 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 6, 2014 at 12:47pm

स्नेही विन्दु जी 

सादर 

बढ़िया बनाने का प्रयास है. 

ये आप बीती है , शब्द कभी रहे नही मेरे पास . 

आपने महसूस किया इतना ही काफी है . 

आभार 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on May 6, 2014 at 11:31am

सत्य को चित्रित करती रचना आदरणीय कुशवाहा जी! सादर अभिनन्दन!

Comment by Vindu Babu on May 6, 2014 at 5:08am

आदरणीय कुशवाहा सर:

कविता अच्छी बनी है...सोचने को प्रेरित करती है।

आपको हार्दिक बधाई इस अभिव्यक्ति के लिए।

सादर

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 5, 2014 at 2:13pm

आदरणीया कुंती दी जी 

aapkआ स्नेह है सादर 

Comment by coontee mukerji on May 5, 2014 at 1:38am

बहुत सुंदर रचना है....हार्दिक बधाई. भाई साहब.

कृपया ध्यान दे...

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