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ग़ज़ल – द्रौपदी नोच डाली गयी घर से सीता निकाली गयी (अभिनव अरुण)

ग़ज़ल –
फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन
२१२ २१२ २१२ २१२ २१२ २१२

द्रौपदी नोच डाली गयी घर से सीता निकाली गयी |
आज या कल के उस दौर में मैं कहाँ कब संभाली गयी |

सब्र तक मुझको मोहलत मिली कब कली अपनी मर्ज़ी खिली ,
एक सिक्का निकाला गया मेरी इज्ज़त उछाली गयी |

लड़का लूला या लंगड़ा हुआ गूंगा बहरा या काला हुआ ,
मुझसे पूछा बताया नहीं सबको मैं ही दिखा ली गयी |

दौर कैसा अजब आ गया एक सबको नशा छा गया ,
सब हैं पैसे के पीछे गए सबकी होली दिवाली गयी |

है न चौकी पुलिस की जहां चाय पीते रहे तुम वहाँ ,
एक काली सफारी रुकी एक लड़की उठा ली गयी |

दिन में जो थी बरामद हुई रात भर थाने में वो रही ,
रात भर जांच उसकी हुई तुमने सोचा बचा ली गयी |

चार कसमों की बाते हुईं चार वादों की रातें हुई ,
चार तोह्फ़े दिखाए गए इस तरह वो मना ली गयी |

बाप की सांस टूटी ही थी माँ को बंधक बनाया गया ,
फिर अंगूठा लगाया गया फिर वसीयत बना ली गयी |

अपने सारे पराये हुए लोग भाड़े के लाये हुए ,
मौत तनहाइयों में हुई और रोने रुदाली गयी |


* मौलिक एवं अप्रकाशित

- अभिनव अरुण

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Comment by Abhinav Arun on June 23, 2014 at 7:31am

आभार आदरणीय श्री आशीष जी ,श्री विजय जी आपके शब्द मेरे लिए प्रेरक हैं , दिल से शुक्रिया आदरणीय !!

Comment by Abhinav Arun on June 23, 2014 at 7:30am

सादर प्रणाम आदरणीय श्री !! आपका आशीष मार्गदर्शन साधिकार चाहिए !!

Comment by आशीष यादव on June 19, 2014 at 7:53pm
Aap ki rachanaayein hmesha se hi behatarin rahi hn. Padh kr mja v aata h aur dil dimag sochne pr v majboor ho jate hn.
Comment by vijay nikore on June 19, 2014 at 1:19pm

इस अच्छी गज़ल के लिए बधाई, आदरणीय अभिनव जी।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 19, 2014 at 8:18am

वाह ! ये अंदाज़ और ये तेवर ! बहुत खूब !
ग़ज़लों को सशक्त स्वर तो मिलता ही रहा है, आपने तो आधिकारिक स्वर भी दे दिया. चूँकि ये कोशिश कइयों की भावनाओं को स्वर देती है तो बिला शक कामयाब है.
सार्थक प्रयास को मेरी शुभकामनाएँ और बधाइयाँ, भाईजी.

Comment by Abhinav Arun on June 14, 2014 at 3:12pm
सुखद है आपकी सहेली के बाद आपकी प्रतिक्रिया मसर्रत अता कर गयी ... बहुत शुक्रिया ..तहे दिल से !! आभार आदरणीया MAHIMA SHREE जी !!
Comment by MAHIMA SHREE on June 14, 2014 at 9:45am

लड़का लूला या लंगड़ा हुआ गूंगा बहरा या काला हुआ ,
मुझसे पूछा बताया नहीं सबको मैं ही दिखा ली गयी |.....

शायद पहली बार इतना कठोर तंज में  समाज के काले चेहरे का  आपने पर्दाफाश किया .. दहला देने वाली घटनाएं आँखों के सामने जैसे गुजरने लगी ... आपकी कलम को नमन .. यादगार ग़ज़ल के लिए ढेरों बधाईयाँ सादर

Comment by Abhinav Arun on June 13, 2014 at 9:12pm
आभार अभिवादन अभिनन्दन आदरणीया गीतिका 'वेदिका' जी , अरसे बाद कुछ लिखा यहाँ , आपका प्रोत्साहन अरसे बाद मिला , धन्य हुआ , धन्यवाद !!
Comment by Abhinav Arun on June 13, 2014 at 9:11pm
आदरणीया गीतिका 'वेदिका' जी आभार अभिवादन अभिनन्दन , मुद्दत बात आपका प्रोत्साहन मिला , ग़ज़ल धन्य हुई !!
Comment by वेदिका on June 13, 2014 at 6:07pm

द्रौपदी नोच डाली गयी घर से सीता निकाली गयी |
आज या कल के उस दौर में मैं कहाँ कब संभाली गयी |

बहुत खूब तञ्ज किया है आप् ने स मा ज की अव्यवस्था पर
हार्दिक शुभकाम्नाये

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