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न जाने कब चाँद निकलेगा

जब सूरज चला जाता है
अस्ताचल की ओट में
और चाँद नहीं निकलता है.
दिखती है उफक पर
पश्चिम दिशा की ओर
लाल लकीरें.
पूरब में काली आँखों वाला राक्षस
खोलता है मुंह
लेता है जोर की साँसे
चलती है तेज हवाएं.
लाल लकीरें डूब जाती हैं,
फिर सब हो जाता है प्रशांत.
मैं पाता हूँ स्वयं को
एक अंध विवर में
हो जाता हूँ विलीन
तम से एकाकार .
खो जाता है मेरा वजूद.
न जाने कब चाँद निकलेगा.

..नीरज कुमार नीर .

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by coontee mukerji on June 13, 2014 at 9:14pm

बहुत सुंदर रचना..हार्दिक बधाई नीरज जी.

Comment by Meena Pathak on June 13, 2014 at 5:53pm

जल्दी बहुत जल्दी निकलेगा .... आमीन 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 13, 2014 at 12:24pm

नीरज जी

आंधियां  थामेन्ही एक दिन i पश्चिम दिशा भी भास्वर होगी i आप अंध भंवर से निकलेंगे ज्योत्स्ना बनकर i  आमीन i

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 13, 2014 at 11:07am

चाँद जल्दी ही निकलेगा निराश ना हों आ0 भाई नीरज जी , हर तमस का अंत तय है , उसे मिटाना ही है. अच्च्ची रचना के लिए बधाई.

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