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अहं के ताज़ को ……………

पूजा कहीं दिल से की जाती है
तो कहीं भय से की जाती है
कभी मन्नत के लिए की जाती है
तो कभी जन्नत के लिए की जाती है

कारण चाहे कुछ भी हो
ये निशिचित है
पूजा तो बस स्वयं के लिए की जाती है

कुछ पुष्प और अगरबती के बदले
हम प्रभु से जहां के सुख मांगते हैं
अपने स्वार्थ के लिए
उसकी चौखट पे अपना सर झुकाते हैं
अपनी इच्छाओं पर
अपना अधिकार जताते हैं
इधर उधर देखकर
प्रभु के परम भक्त होने पर इतराते हैं
अपने स्वार्थ के लिए
चन्द सिक्के दान कर
महा दानी बन जाते हैं
इस काया और माया पे
किसका अधिकार है
ये भी भूल जाते हैं
जानते हैं इस नश्वर संसार में
हर शै नाशवान है
फिर भी अपनी साँसों पे
कितना अभिमान है
मंदिर जाकर सर को झुकाकर
शायद भौतिक संतुष्टि तो हो जाएगी
मगर जब तक उसके दरबार में
अहं के ताज़ को तज कर सर न झुकायेंगे

न ईश हमें मिल पायेगा
न ईश के हम हो पायेंगे


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 21, 2014 at 1:25pm

 जब तक उसके दरबार में 
अहं के ताज़ को तज कर सर न झुकायेंगे

न ईश हमें मिल पायेगा 
न ईश के हम हो पायेंगे... बहुत ही सुन्दर! अनुकरणीय!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 21, 2014 at 12:39pm

एक स्वार्थ निहित मानव सच्चाई को बहुत सुन्दरता से रचना में उभारा है और अंत तो बहुत ही नेक सन्देश सुना रहा है 

मगर जब तक उसके दरबार में 
अहं के ताज़ को तज कर सर न झुकायेंगे

न ईश हमें मिल पायेगा 
न ईश के हम हो पायेंगे...सच बहुत सुन्दर पंक्तिया 

आपको इस सार्थक रचना हेतु बहुत बहुत बधाई आ० सुशील सरना जी 

Comment by Meena Pathak on June 21, 2014 at 9:02am

मंदिर जाकर सर को झुकाकर 
शायद भौतिक संतुष्टि तो हो जाएगी 
मगर जब तक उसके दरबार में 
अहं के ताज़ को तज कर सर न झुकायेंगे

न ईश हमें मिल पायेगा 
न ईश के हम हो पायेंगे.....................बहुत सुंदर प्रस्तुति .. बधाई , सादर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 20, 2014 at 1:12pm

आदरणीय i क्या बात है सरना जी  i मै जब भी आपको पढता हूँ  i कुछ नया पाता हूँ i  न ईश हमें मिल पायेगाi  न ईश के हम हो पाएंगे i लाजवाब i आपके विचार संगठित है i  बधाई स्वीकार करे i

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 20, 2014 at 9:46am

बहुत सुन्दर प्रस्तुति आ० भाई सुशील जी , कोटि कोटि बधाई स्वीकारें .

Comment by coontee mukerji on June 19, 2014 at 11:50pm

पूजा कहीं दिल से की जाती है
तो कहीं भय से की जाती है
कभी मन्नत के लिए की जाती है
तो कभी जन्नत के लिए की जाती है

कारण चाहे कुछ भी हो
ये निशिचित है
पूजा तो बस स्वयं के लिए की जाती है......बहुत सुंदर.

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