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कुण्डलिया छन्द -- (पहला प्रयास )

लग कर छाती से हुए, बडे और बलवान
निज जननी के सामने, ठाडे सीना तान
ठाडे सीना तान , लाज आये ना उनको
बेशर्मी ली लाद , न भाये अपने मन को
आहत है माँ खूब, दुखी रातों में जगकर
चूसे मां का खून , पले जो छाती लगकर ||

मीना पाठक 
मौलिक अप्रकाशित 

Views: 671

Comment

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Comment by Meena Pathak on June 23, 2014 at 7:28am

आदरणीय सुशील सरन जी ..आदरणीय गिरिराज भंडारी जी..आदरणीय जवाहरलाल जी आप सभी की रचना पर उपस्थिति और सराहना हेतु हार्दिक आभार ..आप सब को पढ़ पढ़ कर ही खुछ सीख पा रही हूँ | सादर 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 22, 2014 at 9:17pm

आदरणीया मीणा पाठक जी, आज के सन्दर्भ में उपयुक्त और सार्थक कुण्डलियाँ!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 22, 2014 at 8:43pm
आदरणीया मीना जी, बहुत अच्छी कुन्डलिया रचना हुई है , बात भी बहुत सटीक कही है , बधाइयाँ ॥
Comment by Sushil Sarna on June 22, 2014 at 8:27pm

वाआअह प्रथम प्रयास और वो भी इतना सुंदर   … हार्दिक बधाई आदरणीय मीना जी 

Comment by Meena Pathak on June 22, 2014 at 5:47pm

आदरणीय गोपाल नारायण जी ..आदरणीया राजेश कुमारी जी , त्रुटियों की तरफ इंगित करने हेतु सादर आभार | आप सब के मार्गदर्शन में सीखने का प्रयास कर रही हूँ | सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 22, 2014 at 5:10pm

ठाडे के स्थान पर यदि अकड़ें करें तो भाव और भी स्पष्ट  होगा ,वैसे आपका पहला प्रयास बहुत  बढ़िया है  बधाई आपको मीना जी 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 22, 2014 at 1:16pm

मीना जी

प्रथम प्रयास i क्या कहने i संगठन दुरुस्त i  ठाढ़े  शब्द का प्रयोग कुछ अखरता है i यहाँ पर  'लेते सीना तान ' शायद अधिक संगत  होता  i फिलहाल आपको सुन्दर रचना की बधाई i

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