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धरती को पैगाम/नवगीत/कल्पना रामानी

 

इन्द्र्देव ने भेज दिया है

धरती को पैगाम।

 

बूँदों से है लिखी इबारत।  

बदलेगी जन-जन की किस्मत।  

मानसून इस बार करेगा

सबके मन की पूरी हसरत।  

 

भर चौमासा घन बरसेंगे

झूम झूम अविराम।

 

हरषेगा खेतों में हँसिया।

अन्न बीज रोपेगा हरिया।

उड़ जाएगी निकल नीड़ से,

बेबस हो महँगाई चिड़िया।

 

हल बैलों सँग गीत माहिया,

गाएगा सुखराम।   

 

होंगे व्यस्त घरों के कोने।

बाँटेंगे भर दूध भगोने।

इसकी-उसकी टंगी मथानी,

उतरेगी फिर दही बिलोने।

 

तवा तपेली रोज़ तपेंगे,

घर-घर सुबहो-शाम।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by कल्पना रामानी on July 7, 2014 at 10:17pm

आपकी रचना पर उपस्थिति  से उत्साह दोगुना हो जाता है आदरणीय सौरभ जी, मन से धन्यवाद आपका


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 7, 2014 at 1:45am

होंगे व्यस्त घरों के कोने।

बाँटेंगे भर दूध भगोने।

इसकी-उसकी टंगी मथानी,

उतरेगी फिर दही बिलोने।

 

तवा तपेली रोज़ तपेंगे,

घर-घर सुबहो-शाम।

ग़ज़ब ! ग़ज़ब ! इस आशावादिता को सादर प्रणाम..

मुग्ध हुआ मन आदरणीया कल्पनाजी.

सादर

Comment by कल्पना रामानी on July 5, 2014 at 9:16am

आपकी प्रशंसा से तो मेरा भी मन झूम उठता है प्रिय प्राची जी, उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 30, 2014 at 7:49pm

वाह वाह 

बहुत ही प्यारा नवगीत आदरणीया कल्पना रामानी जी 

बरखा के आने की दस्तक पर मन झूम उठा बहुत सुन्दर शब्दचित्र उकेरते इस नवगीत के साथ 

बहुत बहुत बधाई 

Comment by कल्पना रामानी on June 25, 2014 at 7:40pm

आदरणीय जवाहरलाल जी हार्दिक आभार

Comment by कल्पना रामानी on June 25, 2014 at 7:39pm

प्रिय गीतिका जी, बहुत धन्यवाद आपका

Comment by कल्पना रामानी on June 25, 2014 at 7:38pm

आदरणीय विजय मिश्र जी, प्रोत्साहित करती हुई टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद

Comment by वेदिका on June 25, 2014 at 5:34pm
बहुत खूब रचना! जीवंत रचना! आपने मानसून को लाइव महसूस करा दिया।
आपको खूब खूब शुभकामनाएं आदरणीया कल्पना दीदी!
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 25, 2014 at 11:40am

रषेगा खेतों में हँसिया।

अन्न बीज रोपेगा हरिया।

उड़ जाएगी निकल नीड़ से,

बेबस हो महँगाई चिड़िया।

 

हल बैलों सँग गीत माहिया,

गाएगा सुखराम।   

मुझे ये पंक्तियाँ बहुत ही अच्छे लगी, सादर बधाई!

Comment by विजय मिश्र on June 24, 2014 at 5:34pm
शब्दों ने गजब की हरियाली छटा फैलाई है ,पढकर मन हरष उठा |साधुवाद कल्पनाजी

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