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लघुकथा : खोटा सिक्का (गणेश जी बागी)

                       "अजी सुनती हो! देख लो तुम्हारे लाड़ले की करतूत, सेकंड इयर का रिज़ल्ट आया है, खीँच खांच के पास हुए हैं जनाब,  दिनभर दोस्तो के साथ मटरगश्ती और मारपीट करते रहते हैं, अब तो बर्दाश्त से बाहर हो गया है |"

                        "अब जाने भी दीजिए जी, बच्चा है, थोड़ी-बहुत ग़लतियाँ तो हो ही जाती हैं, आपको पता है,  बिटिया बता रही थी कि भाई के कारण ही कॉलेज मे कोई उसकी तरफ आँख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं करता।"


(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 3, 2014 at 3:16pm
आदरणीय बागी जी ..बहिनों की हिफाजत के लिए भाई को अपना करियर कुर्वान करना पड रहा है ..मैं सन्देश को महसूस कर रहा हूँ वर्तमान परिवेश में चिंतन के लिए प्रेरित करती इस शानदार लघु कथा के लिए सादर बधाई ..
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 3, 2014 at 8:48am

बेटियों की देश में असुरक्षा को लेकर जो चिंताएं सता रही है, उसकी चिंता के आगे बेटे का पढ़ाई में कम रुझान भी बर्दाश करने 

की मज़बूरी दर्शाती सुन्दर लघु कथा के लिए हार्दिक बधाई श्री गणेश जी "बागी" जी 

Comment by Shubhranshu Pandey on July 2, 2014 at 9:52pm

आदरणीय गणेश भईया. 

सुन्दर कथा...पिता हमेशा से अपने पुत्र को शिक्षा और व्यवहार में आगे बढ़ते हुये देखना चाहता है. माँ अपने पुत्र को दमदार देखना चाहती है. ये एक बेसिक अन्तर है जिसके कारण माता अपने पुत्र की हठधर्मिता को अनदेखा करती है...

राजेश कुमारी जी ने कथा को बिन्दुवत् विस्तार दे दिया है..जिसमें सारी बाते आ गयीं हैं..

सादर.

 

Comment by savitamishra on July 2, 2014 at 9:16pm

बहुत बढ़िया ...दुर्गुणों की बाढ़ में एक दुर्गुण यह भी जो किसी के लिए भला भी बन गया 

Comment by Priyanka singh on July 2, 2014 at 5:11pm

अच्छी लघु कथा .....आपको हार्दिक बधाई।

Comment by वेदिका on July 2, 2014 at 11:02am
वाह! बहुत खूब है ये पुत्र मोह भी। जिसकी पट्टी आँखों पर होने से सपूत जी के दुर्गुण तो नहीं नजर आते, पर गुण नही होने पर भी नजर आ जाते है। बधाई आ0 बागी जी!!
Comment by vijay nikore on July 1, 2014 at 4:16pm

लघुकथा अच्छी बनी है। हार्दिक बधाई।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 1, 2014 at 10:19am

आदरणीय गणेश भाई , महाभारत सीरियल मे जब अर्जुन एक तीर चलाता था , आकाश मे पहुँच कर कई तीरों मे बंट जाता था , और कई शत्रु उसके निशाने मे आ जाते थे एक साथ , बस  वैसे ही आपकी ये लघु कथा लगी , समाज की कई बुराइयाँ एक साथ घायल हैं ।आपको मेरी दिली बधाइयाँ ॥

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 1, 2014 at 9:56am

एक तीर से चार -चार शिकार , कोटि कोटि नमन आ० गणेश भाई जी ,


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 1, 2014 at 9:02am

आदरणीया राजेश कुमारी जी, लघुकथा पर आपकी समीक्षात्मक टिप्पणी पढ़कर मन मुग्ध है, लघुकथा में निहित एक-एक तत्वों की व्याख्या आपकी पैनी दृष्टि का परिचायक है, बहुत बहुत आभार आदरणीया । 

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