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कल हुआ जो वाक़या, अच्छा लगा।

हाथ तेरा थामना अच्छा लगा।

जिस्म तो काँपा जो तूने प्यार से,

कुछ हथेली पर लिखा, अच्छा लगा।

देखकर मशगूल हमको इस कदर,

चाँद  का  मुँह फेरना अच्छा लगा।

घाट रेतीले जलधि के नम हुए,

मछलियों का तैरना अच्छा लगा।

 

आसमाँ में बिजलियों की कौंध में,

बादलों का काफिला अच्छा लगा।

 

नाम ले तूने पुकारा जब मुझे,

वादियों में गूँजना अच्छा लगा।

 

बर्फ में लिपटे पहाड़ों का बहुत,

दूर तक वो सिलसिला अच्छा लगा।   

 

“कल्पना” फिर वो तेरा वादा प्रियम!

उम्र भर के साथ का अच्छा लगा।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by vandana on July 4, 2014 at 6:33am

बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल आदरणीया 

Comment by वेदिका on July 3, 2014 at 11:14pm
कितनी प्यारी रूमानी गजल है! अभिनव प्रयोग अच्छा लगा!
बधाई आदरणीया दी!
Comment by mrs manjari pandey on July 3, 2014 at 8:39pm
आदरणीया बहुत ही मनमोहक प्यारी सी ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकारें
Comment by Tilak Raj Kapoor on July 3, 2014 at 1:22pm

उम्‍दा ग़ज़ल है कल्‍पना जी। बधाई।

Comment by S. C. Brahmachari on July 2, 2014 at 9:36pm
कल्पना का प्रकृति से यूं खेलना ,
गजल का अंदाज़ खूब अच्छा लगा । ---- खूबसूरत गजल के लिए आपको हार्दिक बधाई ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 2, 2014 at 4:43pm

वाह्ह्ह्ह वह्ह्ह बहुत ही दिलकश मन मोहक ग़ज़ल लिखी है दी ,सभी शेर शानदार हुए |हार्दिक बधाई आपको |

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 2, 2014 at 2:41pm

महनीया / इतनी नाजुक और सुन्दर गजल आप ही लिख सकती है / किस किस शेर की बात करू / कुछ जो बहुत आचे लगे वे इस प्रकार है /

जिस्म तो काँपा जो तूने प्यार से,

हाथ पर कुछ लिख दिया, अच्छा लगा।

नाम ले तूने पुकारा जब मुझे,

वादियों में गूँजना अच्छा लगा।

मतला और मक्ता दोनों ला -जवाब  i प्रियम शब्द का प्रयोग मन मोह लेता है i आदरणीया i

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