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हम जैसे सीधे सादो को क्यूँ बहकाते हो तुम

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चलते चलते इन राहों में जब मिल जाते हो तुम

जाने क्या हो जाता है जो यूं सकुचाते  हो तुम

 

तेरी आँखों में लगता है काला कोइ जादू

जिसपे नजरें पड़ जाती उसको भरमाते हो तुम

 

इक पल को आते हो छत पर फिर गुम हो जाते हो

क्या बच्चो के जैसा ही हमको बहलाते हो तुम

 

उजला उजला योवन तेरा फूलों सा है भाये

क्यूँ छुईमुई जैसा छू लेने पर मुरझाते हो तुम

 

तेरी इन मादक आँखों से मदिरा छलका करती

हम जैसे सीधे सादो को क्यूँ बहकाते  हो तुम

 

गुल बागों की रौनक हैं उनको महकाया करते

घुलकर साँसों में जीवन को महकाते हो तुम

 

सागर लहरों में इक नैया ज्यों हिचकोले खाए

पागल हो मन जब इक नागिन सा लहराते हो तुम

 

चंचल मन मदमाता योवन नीली नीली आँखें

तिरक्षी नजरों से प्रेमी तन को ललचाते हो  तुम

मौलिक व अप्रकाशित 

 

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 4, 2014 at 12:47pm

आदरणीय लक्ष्मण जी ..आपकी उत्साह बढाने वाली इस प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल बधाई सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 4, 2014 at 12:47pm

आदरणीय जीतेन्द्र जी ..आपने मेरी रचना बार बार पढी ..मुझे बेहद सुखद अहसास मिला ..इन्ही हौसलों से मैं उड़ने की कोशिस करूंगा  सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 4, 2014 at 12:45pm

आदरणीया मंजरी जी ..रचना पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल धन्यवाद सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 4, 2014 at 12:45pm

आदरणीय गोपाल सर ..आपके इन शब्दों ने मेरी रचनाधर्मिता को नव उर्जा से लवरेज किया है ..आपका आशीष यूं हे मिलता रहे ..सादर प्रणाम के साथ 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 4, 2014 at 11:45am

उजला उजला योवन तेरा फूलों सा है भाये

क्यूँ छुईमुई जैसा छू लेने पर मुरझाते हो तुम

वाह... क्या कहने आ० भाई आशुतोष जी  l इस सुन्दर ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई l 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 4, 2014 at 11:19am

बहुत ही सुंदर गजल आदरणीय डा.आशुतोष जी, बार-बार पढ़ी बहुत खूब, आपको दिली बधाई

Comment by mrs manjari pandey on July 3, 2014 at 8:28pm
आदरणीय डॉक्टर आशुतोष जी कोमल सी सुन्दर ग़ज़ल। बहुत बहुत बधाई
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 3, 2014 at 7:27pm

मित्र आपकी

सुकुमार कविता से प्रसाद जी याद  आगये - वे कहते है - तुम कनक किरण  के अन्तराल में लुक-छिप  कर रहते हो क्यों  ? हे ! लाज भरे सौन्दर्य बता दो मौन बने रहते हो क्यों ?

सादर i                              

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