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चीखकर ऊँचे स्वरों में कह रहा हूँ --जगदीश पंकज

चीखकर ऊँचे स्वरों में
कह रहा हूँ
क्या मेरी आवाज
तुम तक आ रही है ?

 

जीतकर भी
हार जाते हम सदा ही
यह तुम्हारे खेल का
कैसा नियम है
चिर -बहिष्कृत हम
रहें प्रतियोगिता से ,
रोकता हमको
तुम्हारा हर कदम है

 

क्यों व्यवस्था
अनसुना करते हुए यों
एकलव्यों को
नहीं अपना रही है ?

 

मानते हैं हम ,
नहीं सम्भ्रांत ,ना सम्पन्न,
साधनहीन हैं,
अस्तित्व तो है
पर हमारे पास
अपना चमचमाता
निष्कलुष,निष्पाप सा
व्यक्तित्व तो है

 

थपथपाकर पीठ अपनी
मुग्ध हो तुम
आत्मा स्वीकार से
सकुचा रही है

 

जब तिरस्कृत कर रहे
हमको निरन्तर
तब विकल्पों को तलाशें
या नहीं हम
बस तुम्हारी जीत पर
ताली बजाएं
हाथ खाली रख
सजाकर मौन संयम

 

अब नहीं स्वीकार
यह अपमान हमको
चेतना प्रतिकार के
स्वर पा रही है

 

----------------------------------------------------------------------------------
मौलिक एवं अप्रकाशित /अप्रसारित ---जगदीश पंकज

Views: 788

Comment

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 10, 2014 at 3:43pm

आदरणीय बहुत सुन्दर  i

अब नहीं स्वीकार
यह अपमान हमको
चेतना प्रतिकार के
स्वर पा रही है-----क्या बात है बधाई  i

Comment by JAGDISH PRASAD JEND PANKAJ on July 10, 2014 at 12:26pm

रचना को पसन्द करके अभिमत प्रकट करने के लिए हार्दिक आभार शिज्जु शकूर जी -जगदीश पंकज


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 10, 2014 at 10:34am

बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति एवम प्रभावशाली रचना है आपको हार्दिक बधाई

कृपया ध्यान दे...

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