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प्रेम की नवल पहेली.... डॉ० प्राची

अचानक ही हो गयीं कुछ पंक्तियाँ....

बदरी के पहलू में

सूरज की अठखेली....

 

सूरज की साज़िश ने

लहरों की बंदिश से बूँद चुराकर,

प्रेम इबारत अम्बर पर लिख दी

सतरंगी पट ओढ़ाकर,

 

बूझ रही फिर भोर

प्रेम की नवल पहेली....

 

आतुर बदरी बेसुध चंचल

लटक मटक नभ मस्तक चूमे,

अंग-अंग सिहरन बिजली सी  

गरज-बरस लहराती झूमे

 

मधुर प्रणय के

स्वप्न संजोती प्रिया नवेली.... 

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by वेदिका on July 19, 2014 at 4:53pm
बारिश का काव्य चित्रण रंग बिरंगा हुआ। आपकी कविता को पढ़ के मन आपके घर घूम आया है। बहुत बहुत शुभकामनाएं स्वीकारिये आदरणीय प्राची दीदी जी!
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 19, 2014 at 4:33pm

महनीया

बिलकुल मौसम के अनुरूप i निम्न पंक्तिया अप्रतिम है -

सूरज की साज़िश नें

लहरों की बंदिश से बूँद चुराकर,

प्रेम इबारत अम्बर पर लिख दी

सतरंगी पट ओढ़ाकर,---------------------------बहुत बहुत बधाई i


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Comment by rajesh kumari on July 18, 2014 at 10:25pm

रिमझिम बरसात में रंग रूप बदलती बदली को देख ऐसी कविताओं का जन्म हो कोई आश्चर्य नहीं बहुत सुन्दर पंक्तियाँ और चित्र भी ,अद्दभुत बधाई आपको प्रिय प्राची जी. 

Comment by kalpna mishra bajpai on July 18, 2014 at 10:17pm

पहेली के साथ सुंदर अंबर झांकी बहुत ही सुंदर । बहुत बधाई आप को /सादर 

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