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‘महिला उत्थान’ मुद्दे पर संगोष्ठी से घर लौटते  ही कुमुद से उसके पति ने कहा... “अभी थोड़ी देर पहले ही दीपा आई थी मिठाई लेकर वो  बहुत अच्छे नम्बरों से पास हुई है  कंप्यूटर कोर्स तो उसका पूरा हो ही गया था,तुम्हारी प्रेरणा और  मार्ग दर्शन से कितना कुछ कर लिया इस लड़की ने हमारे घर में काम करते-करते....  अब सोचता हूँ अपने ऑफिस में एक वेकेंसी निकली है इसको रखवा दूँ “

 कुमुद कुछ सोच कर बोली”अजी इतनी भी क्या जल्दी, वैसे भी सोचो इतनी अच्छी काम वाली फिर कहाँ मिलेगी, फिर तो ये काम करेगी नहीं”!!!

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by Shubhranshu Pandey on July 21, 2014 at 1:58pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी, 

सुन्दर कथा. समाज के दूसरे पहलु को सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है. सहायता भी उतनी ही करो जितने में स्वयं का फ़ायदा कम ना हो. सहायता देने के बाद भी उसे परमुखापेक्षी ही बनाये रखने की चाहत नियत को गंदा करते हैं..

सादर.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 21, 2014 at 12:45pm

बहुत ही बढ़िया लघुकथा. यहाँ तो सिर्फ नौकरानी की बात है मैंने कई जगह देखा है लोग अपनी बहु जो अपने पति के साथ दुसरे शहर में रहकर पढाई कर रही हो ,उसे किसी न किसी तरीके से घर के काम और अपनी स्वतंत्रता के लिए दवाब डालकर बुला लेते है. अक्सर यह भी देखने को मिलता है कि महिला ही महिला के प्रति एक दुर्भाव रखती हैं.

आपकी लघुकथा पर आपको अनेकोनेक बधाइयाँ ,आदरणीया राजेश दीदी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 21, 2014 at 10:53am

आ० डॉ गोपाल नारायण जी ,लघु कथा पर आपकी हर्षवर्धन करती प्रतिक्रिया हेतु दिल से आभारी हूँ सादर. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 21, 2014 at 10:47am

आ० संतलाल करुण जी ,आपसे अनुमोदन पाकर रचना धन्य  हुई, मेरा लिखना सार्थक हुआ ह्रदय तल से आभार आपका |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 21, 2014 at 10:45am

प्रिय वेदिका ,आपको ये लघु कथा इसका भाव प्रभावित किया मेरा लिखना सार्थक हुआ ,ये दोयम व्यवहार तो हर दूसरे तीसरे  कदम पर मिल जाएगा देखने को |हार्दिक आभार आपका सस्नेह 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 20, 2014 at 9:31pm

वाह वाह और वाह------

बहुत सुन्दर महनीया i

Comment by Santlal Karun on July 20, 2014 at 8:11pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी,

दाम्पत्य और कार्यालयी जीवन को जोड़ती समस्यापरक पठनीय लघु कथा, हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

Comment by वेदिका on July 20, 2014 at 6:40pm

दोयम व्यवहार कैसे तो निभा ले जाते है लोग, समाज के सामने कुछ और व्यक्तिगत रूप से कुछ और। इस विसंगति पर चोट करती हुयी कथा पर बधाई आदरणीय दीदी जी!

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