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दिनकर मनमाना हुआ, गई धरा जब ऊब।
सूर्य रश्मियाँ रोक के, ......मेघा बरसे खूब।

त्राही दुनियां में मची, संकट में सब जीव।
बरखा रानी आ गई, .....कहे पपीहा पीव।

झूम रहे पत्ते सभी, पवन गा रही गीत।
वन्दन बरखा का करें, निभा रहें हैं रीत।

रंग धरा के खिल गए, शीतल पड़ी फुहार।
वन कानन नन्दन हुए , झूम उठा संसार।

पुष्प सभी हैं खिल उठे, जल की पड़ी फुहार।
भ्रमरों ने गुंजन किया, तितली ने मनुहार।

जल निमग्न धरती हुई, जन जीवन फिर त्रस्त।
दिनकर जैसे लग रहा, ......दिन में होता अस्त।

सूरज बिन सुबहा हुई, बिन सूरज ही साँझ।
घिरती मेघों से धरा,... आये काजल आँज।

नमन नहीं बालार्क को, सब ही हुए निराश।
बिन लाली के आ रही, ....ऊषा रोज हताश।

.
सीमाहरि शर्मा 29.07.2014
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 557

Comment

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Comment by seemahari sharma on August 4, 2014 at 9:06pm
आदरणीय Saurabh Pandey जी बहुत बहुत आभार आपका आपकी प्रतिक्रिया से प्रोत्साहन मिला

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 4, 2014 at 12:45am

छन्दों पर हुआ प्रयास संतोषदायी है आदरणीया सीमाजी. प्रयासरत रहें.

सादर

Comment by seemahari sharma on August 1, 2014 at 11:21pm
बहुत आभार इस प्रोत्साहन के लिये डॉ.गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी सादर।
Comment by seemahari sharma on August 1, 2014 at 11:18pm
बहुत आभारा आपका Laxman prasad Ladiwalaji सादर।
Comment by seemahari sharma on August 1, 2014 at 11:14pm
ह्रदय से आभार Vandana जी।
Comment by seemahari sharma on August 1, 2014 at 11:13pm
बहुत आभार Vijai shanker जी सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 29, 2014 at 10:20pm
बरखा पर दोहे अच्छे हैं , आदरणीय सीमा हरीशर्मा जी बधाई .
Comment by vandana on July 29, 2014 at 9:01pm


रंग धरा के खिल गए, शीतल पड़ी फुहार।
वन कानन नन्दन हुए , झूम उठा संसार।

पुष्प सभी हैं खिल उठे, जल की पड़ी फुहार।
भ्रमरों ने गुंजन किया, तितली ने मनुहार।

बहुत सुन्दर दोहे आदरणीया 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 29, 2014 at 4:09pm

मन मोहक दोहे रचना के लिए बधाई -

पुष्प सभी हैं खिल उठे, जल की पड़ी फुहार।
भ्रमरों ने गुंजन किया, तितली ने मनुहार। -  वाह !

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 29, 2014 at 12:11pm

बहुत सुन्दर दोहे i क्या बात है -----

नमन नहीं बालार्क को, सब ही हुए निराश।

बिन लाली के आ रही, ....ऊषा रोज हताश।

.

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