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१-

जहाँ अश्रु की बूँदें

रोने वालों के दुखों को,

दुखों की सान्ध्रता को

कम कर देती है

 

वहीं पर यही अश्रु बूँदें

रोने वालों से भावनाओं से जुड़े

उनके अपनों को

बेदम भी कर देती है

 

२-

संयत नहीं हो पाए अगर आप

अपने भाव के साथ

तो वही भाव,

कहे गये शब्दों के अर्थ बदल देता है

 

और वहीं

अगर आप सही नहीं समझ पाए शब्दों को

तो शब्द,

आपके चहरे से प्रकट

भावों के अर्थ बदल देता है

**************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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Comment by savitamishra on August 20, 2014 at 7:44pm

संयत नहीं हो पाए अगर आप

अपने भाव के साथ

तो वही भाव,

कहे गये शब्दों के अर्थ बदल देता है.......बहुत सही बात कहीं भैया आपने ......सादर नमस्ते

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 20, 2014 at 9:52am

क्षणिकाओं के माध्यम से अच्छा और सार्थक विचार मंथन हुआ है | बधाई स्वीकारे भाई श्री गिरिराज भंडारी जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 19, 2014 at 9:47pm

आदरणीया राजेश जी , सराहना के लिए आपका आभार |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 19, 2014 at 9:46pm

आदरणीय जवाहर लाल भाई , रचना की सराहना के लिए आपका बहुत बहुत आभार |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 19, 2014 at 9:29pm

दोनों ही क्षणिकाएँ सार्थक और बहुत अच्छी हैं आ० गिरिराज जी ,हार्दिक बधाई. 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on August 19, 2014 at 8:30pm

आदरणीय श्री गिरिराज जी, सादर अभिवादन!

मैं तो सिर्फ 'गजब' कहूँगा ..क्या खूब कहा है ...आपने सत्य को निरूपित करने का अंदाज ! शब्द और चेहरे के भाव!

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 19, 2014 at 11:05am

आ०   भाई गिरिराज जी इन क्षणिकाओं के माध्यम से आपने जो कहा वह अनमोल है . हार्दिक बधाई स्वीकारें .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 19, 2014 at 7:53am

आदरणीय राम शिरोमणि भाई , आपका बहुत बहुत आभार |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 19, 2014 at 7:52am

आदरणीया कल्पना जी , उत्साह वर्धन के लिए आपका बहुत शुक्रिया |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 19, 2014 at 7:51am

आदरणीया मीना जी , सराहना के लिए आपका आभार |

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