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ज़िन्दगी के साथ चल कर देखिये-ग़ज़ल

2122/ 2122/ 212

घर से बाहर तो निकल कर देखिये

ज़िन्दगी के साथ चल कर देखिये

 

आपको अंधा न कर दे वो चमक

शम्स को थोड़ा सँभल कर देखिये

 

आजमाया है मुझे ही अब तलक

इक दफा खुद को बदल कर देखिये

 

चार सू बस आप ही होंगे जनाब

शम्अ की मानिन्द जल कर देखिये

 

आसमाँ के है मुकाबिल हस्ती क्या

देखना हो तो उछल कर देखिये

 

तर्क़े ताल्लुक तो बहुत आसान है

कालिबे निस्बत में ढल कर देखिये

 

तर्क़े ताल्लुक= रिश्ता तोड़ना

कालिबे निस्बत में= रिश्तों के साँचे में

 

-मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 26, 2014 at 8:31pm

आदरणीया राजेश दीदी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 26, 2014 at 8:31pm

आदरणीय नरेन्द्र सिंह जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 26, 2014 at 8:30pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 26, 2014 at 8:29pm

आदरणीया कल्पना जी आपका तहेदिल से शुक्रिया
सादर,

Comment by विजय मिश्र on August 26, 2014 at 6:13pm
शिज्जू भाई ! फिर एक दमदार गजल के लिए ढ़ेरों मुबारकवाद |

"आजमाया है मुझे ही अब तलक
इक दफा खुद को बदल कर देखिये |" --- बेहतरीन , एक दफा फिर शुक्रिया |
Comment by Nilesh Shevgaonkar on August 26, 2014 at 6:11pm

waah waah waah ....aakhiri sher jo bahut hii qaatil hua hai ..
kya kahne waah ..
ek sujhaav hai ..Soory ko yadi Shams kar saken to flow aur badh jaaega 
saadar

Comment by Pawan Kumar on August 26, 2014 at 5:57pm

अनुपम प्रस्तुति के लिए सादर बधाई ...


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 25, 2014 at 8:45pm

बेहतरीन ग़ज़ल हुई है , आदरणीय शिज्जू भाई , आपको दिली मुबारक बाद |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 25, 2014 at 8:17pm

तर्क़े ताल्लुक तो बहुत आसान है

कालिबे निस्बत में ढल कर देखिये--गज़ब 

बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई शिज्जू भैया तहे दिल से दाद कबूलें 

 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 25, 2014 at 11:23am

आदरणीय भाई शिज्जू शकूर जी , इस उम्दा गजल के लिए बहुत बहुत हार्दिक बधाई स्वीकारें ।

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