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फुसफुसाने की आवाज सुन काजल जैसे ही पास पहुँची सुना कि -तुम आ गये न, मैं जानती थी तुम जरुर आओगें, सब झूठ बोलते थे, तुम नहीं आ सकते अब कभी|
"भाभी आप किससे बात कर रही हैं कोई नहीं हैं यहाँ"
"अरे देखो ये हैं ना खड़े, जाओ पानी ले आओ अपने भैया के लिय बहुत प्यासे है|"
डरी सी अम्मा-अम्मा करते ननद के जाते ही भाभी गर्व से मुस्करा दी|

सविता मिश्रा

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by savitamishra on September 24, 2014 at 10:12pm

आदरणीय राजेश दी आभार तहेदिल से आपका जो आपको पसंद आई अपन लेखन सफल रहा

Comment by savitamishra on September 24, 2014 at 10:12pm

आदरणीय विजय भैया आभार है हम आपके .....सुन्दर लाइनें दें आपने इस कथा को मान दे दिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 24, 2014 at 9:13pm

डरी सी अम्मा-अम्मा करते ननद के जाते ही भाभी गर्व से मुस्करा दी----लघु कथा की इस अंतिम पंक्ति ने भाभी के चरित्र का अनावरण कर  दिया एक पञ्च की तरह लगा यही इस लघु कथा की विशेषता है | बहुत बहुत बधाई आपको सवितामिश्रा जी ,आजकल रिश्तों से ही विश्वास उठ चला है किस के दिल में क्या छुपा है कह नहीं सकते |

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 24, 2014 at 9:00pm
कोई अकेलेपन से भागता है
कोई अकेलेपन के लिए भागता है
रिश्ते बदल रहे हैं या
नैये रूप गढ़ रहे हैं ।
दुनियाँ वही है ,
दुनियाँदार बढ़ रहे हैं ,
वही शायद कुछ नया गढ़ रहें हैं ॥
आपकी लघु कथा के लिए सादर आदरणीय सविता मिश्रा जी.
Comment by savitamishra on September 24, 2014 at 7:55pm

बहुत बहुत शुक्रिया आप सभी का तहेदिल से ..यूँ ही सदा मार्गदर्शन करते रहें आपके कमेन्ट हमें संबल प्रदान करते है!

Comment by Pawan Kumar on September 24, 2014 at 4:49pm

बहुत ही बढिया लघुकथा ....... बधाई सादर!

Comment by harivallabh sharma on September 24, 2014 at 1:54pm

इंतजार कभी ख़त्म नहीं होता अनवरत चलता जीवन के साथ..बहुत सुन्दर प्रस्तुति बधाई आदरणीया सविता मिश्रा जी.

Comment by Shyam Narain Verma on September 24, 2014 at 1:18pm

सुन्दर लघुकथा के लिए दिली बधाइयाँ |

Comment by savitamishra on September 24, 2014 at 1:14pm

शुक्रिया आपका अप्ररुब करने के लिए

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