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तेरी किताब का तो दिल धड़क रहा होगा (ग़ज़ल)

1212-1122-1212-22    

तमाम उम्र जो ज़ेब-ए-पलक रहा होगा

नज़र से गिर के भी कितना चमक रहा होगा

सफ़र अँधेरों का है, फिर भी इक दिलासा है

कोई चराग़ मेरी राह तक रहा होगा

लिखा है शेर मेरा दरमियानी सफ़हे पर

तेरी किताब का तो दिल धड़क रहा होगा

गुलाबी ख़ुशबुओं की बूँदें बादलों की नहीं

वो छत से गीला दुपट्टा लटक रहा होगा

परिंदे शाम को लौटे तो मुझको याद आया

हमारा साथ भी कुछ शाम तक रहा होगा

किसी ने छीन लिया है मुझे मुक़द्दर से

कोई फ़िज़ूल दुआओं में थक रहा होगा

मैं कैसे मान लूँ है चाँद सी भी शै 'ताबिश'

सियाह शाल में कंगन चमक रहा होगा

+++++++++

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by रमेश कुमार चौहान on October 1, 2014 at 7:33pm

बहुत सुन्दर i लाजवाब i  हार्दिक बधाई आदरणीय

Comment by MAHIMA SHREE on September 30, 2014 at 5:04pm

गुलाबी ख़ुशबुओं की बूँदें बादलों की नहीं

वो छत से गीला दुपट्टा लटक रहा होगा....वाह कमाल की ग़ज़ल कही है ..हार्दिक बधाई आपको 

Comment by seema agrawal on September 29, 2014 at 11:28pm

बेहद खूबसूरत ग़ज़ल...... हर शेर लाजवाब ...हर ख्याल नया ........

मैं कैसे मान लूँ है चाँद सी भी शै 'ताबिश'

सियाह शाल में कंगन चमक रहा होगा

सफ़र अँधेरों का है, फिर भी इक दिलासा है

कोई चराग़ मेरी राह तक रहा होगा.................ज़रूर ...आप खुद ही चमकते हुए राह दिखाने वाले चराग़ होंगे एक दिन 

लिखा है शेर मेरा दरमियानी सफ़हे पर

तेरी किताब का तो दिल धड़क रहा होगा

गुलाबी ख़ुशबुओं की बूँदें बादलों की नहीं

वो छत से गीला दुपट्टा लटक रहा होगा............इन दोनों शेर में जो मासूमियत और नयापन है उसके लिये आप को दिल से मुबारकबाद ..........सलामत रहें और ऐसी ही अनगिनत गज़लें आपकी जानिब से पढ़ने को मिलती रहें 

 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 29, 2014 at 11:13am

दानिश जी ..ग़ज़ल की जिनती भी तारीफ़ की जाए कम है ..लेकिन आदरणीया राज जी के मशविरे में मैं अपना एक निवेदन जोड़ना चाहता हूँ कृपया उर्दू के तमाम शब्दों की बजह से कभी समझने में असुबिधा होती है मेहरवानी होगी यदि उर्दू शब्दों का अर्थ भी आप लिख दें तो हम जैसे सीखने वाले समझ भी लें और उर्दू के नए शब्दों को सीख भी लें ..एक बार पुनः ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ सादर 


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Comment by rajesh kumari on September 28, 2014 at 6:50pm

लिखा है शेर मेरा दरमियानी सफ़हे पर

तेरी किताब का तो दिल धड़क रहा होगा----लाजबाब 

किसी एक शेर की क्या कहूँ हर शेर शानदार है दानिश जी बहुत खूबसूरत ग़ज़ल है ,एक गुजारिश है आपसे जैसे कि सीखने सिखाने की द्रष्टि से ओबिओ पर पोस्ट करते समय बह्र भी लिखी जाती है वो लिख देते तो हम जैसे सीखने वालों के लिए आसान हो जाता 

खैर बहरहाल आप दाद कबूलें इस सुन्दर ग़ज़ल के लिए |

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 28, 2014 at 12:48pm

बहुत सुन्दर i लाजवाब i

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 28, 2014 at 10:49am
लिखा है शेर मेरा दरमियानी सफ़हे पर
तेरी किताब का तो दिल धड़क रहा होगा
गुलाबी ख़ुशबुओं की बूँदें बादलों की नहीं
वो छत से गीला दुपट्टा लटक रहा होगा
मैं कैसे मान लूँ है चाँद सी भी शै 'ताबिश'
सियाह शाल में कंगन चमक रहा होगा
बहुत खूब , बहुत खूब जनाब जुबैर अली ' ताबिश ' जी , बहुत बहुत बधाई इस ग़ज़ल के लिए .

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