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फूल हमेशा बगिया में ही, प्यारे लगते।

नीले अंबर में ज्यों चाँद-सितारे लगते।

 

बिन फूलों के फुलवारी है एक बाँझ सी,

भरी गोद में  माँ के राजदुलारे लगते।

 

हर आँगन में हरा-भरा यदि गुलशन होता,

महके-महके, गलियाँ औ’ चौबारे लगते।

 

दिन बिखराता रंग, रैन ले आती खुशबू,

ओस कणों के संग सुखद भिनसारे लगते।

 

फूल, तितलियाँ, भँवरे, झूले, नन्हें बालक,

मन-भावन ये सारे, नूर-नज़ारे लगते।

 

मिल बैठें, बतियाएँ इनसे, जी चाहे जब,

स्वागत में ये पल-पल बाँह पसारे लगते।

 

घर से बेघर कभी ‘कल्पना’ करें न इनको,

तनहाई में ये ही खास हमारे लगते।

मौलिक व अप्रकाशित  

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Comment

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Comment by कल्पना रामानी on October 5, 2014 at 6:37pm

प्रिय राजेश कुमारी जी, गजल की सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद। यह  मात्रिक बहर ही है, 222...इसलिए नहीं लिखी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 2, 2014 at 12:40pm

आदरणीय कल्पना बहन इस सुंदर गजल के लिए हार्दिक बधाई ।

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on October 1, 2014 at 6:55pm

बहुत बधाई कल्पना जी ,"तनहाई में ये ही खास हमारे लगते।" तन्हाई का अपनापन ही तो अपनत्व की अनंतता है.भीड़ और कोलाहल में कुछ पता ही नहीं चलता.

Comment by harivallabh sharma on September 30, 2014 at 12:20pm

बहुत ही मनोहारी ग़ज़ल हुयी है आदरणीया...वाकई बिना फूलों के क्यारी की क्या शोभा...पेड़ पोधों से तादात्य्म स्थापित कराते अशआर लाजबाब ..

दिन बिखराता रंग, रैन ले आती खुशबू,

ओस कणों के संग सुखद भिनसारे लगते।

 

फूल, तितलियाँ, भँवरे, झूले, नन्हें बालक,

मन-भावन ये सारे, नूर-नज़ारे लगते।....अत्यंत बधाई आपको आदरणीया कल्पना रामानी जी.

Comment by Neeraj Neer on September 30, 2014 at 9:20am

बहुत सुंदर गजल... हार्दिक बधाई

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 29, 2014 at 10:52pm

बहुत सुंदर गजल कही आदरणीया कल्पना जी. सदा की तरह सादगी से परिपूर्ण भाव, बहुत-२ बधाई आपको

Comment by seemahari sharma on September 29, 2014 at 6:19pm
बहुत सुंदर गजल है कल्पना जी बधाई ।आपका प्रकृति प्रेम वाह
Comment by Shyam Narain Verma on September 29, 2014 at 5:24pm

" सुंदर गजल के लिए हार्दिक बधाई   "

सादर............. 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 29, 2014 at 11:04am

आदरणीया कल्पना जी ...इस बेहतरीन ग़ज़ल का हर शेर शानदार है 

 

बिन फूलों के फुलवारी है एक बाँझ सी,

भरी गोद में  माँ के राजदुलारे लगते।

 

हर आँगन में हरा-भरा यदि गुलशन होता,

महके-महके, गलियाँ औ’ चौबारे लगते।,,,इन दो शेरो पर बिशेष रूप से बधाई स्वीकार करें सादर 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on September 28, 2014 at 7:56pm

गज़ल अच्छी  लगी, हार्दिक बधाई 

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