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लघुकथा : दिवाली

"बाबू जी, दीये ले लो, बहुत सस्ते हैं, इतना बड़ा त्यौहार है ! "

आठ साल की फटी हुई फ्रॉक ने एक रेशम के कुर्ते को पीछे से खींचते हुए पूछा !

"अच्छा, बड़ा त्यौहार है ! पता भी है क्यों मनाते हैं बड़ा त्यौहार ?"

" हाँ, भगवान रामचन्दर ने बहुत सारे दीये ख़रीदे थे !"

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by Shubhranshu Pandey on October 28, 2014 at 11:31am

बहुत मार्मिक कथा.

सादर.

Comment by Neeles Sharma on October 14, 2014 at 6:58am

खुर्शीद जी ,बहुत बहुत शुक्रिया आपके प्रोत्साहन के लिए ,आभारी हूँ !

Comment by khursheed khairadi on October 13, 2014 at 10:33pm

आदरणीय नीलेश जी बहुत मार्मिक ,सुन्दर रचना है |बचपन में एक कहानी पढ़ी थी जिसमें एक कुल्फ़ी वाला भरी दोपहर में निकल रही एक शवयात्रा के राम नाम सत्य है के साथ 'ठंडी मीठी कुल्फ़ी 'की टेर लगा बैठता है |आपकी रचना वैसी ही सार्थक है |हार्दिक अभिनन्दन 

Comment by Neeles Sharma on October 13, 2014 at 10:30am

बहुत बहुत धन्यवाद स्वर्ण नायक जी 

Comment by Neeles Sharma on October 13, 2014 at 10:29am

आपका प्रोत्साहन अच्छा लिखने को प्रेरित करेगा जितेंदर जी 

Comment by Neeles Sharma on October 13, 2014 at 10:28am

तहेदिल से शुक्रिया आपका mam rajesh kumari ji

Comment by Neeles Sharma on October 13, 2014 at 10:27am

बहुत बहुत शुक्रिया भाई  somesh kumar जी 

Comment by संदेश नायक 'स्वर्ण' on October 13, 2014 at 1:25am

बंधु निलेस जी, इस भावात्मक एवं गागर में सागर सहेज लेने वाली लघु कथा के लिए आपको बहुत बहुत बधाई ।  

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 13, 2014 at 12:05am

बहुत ही सुंदर लघुकथा. दिल को छू गई उतनी ही  मासूमियत से, बहुत -बहुत बधाई आपको आदरणीय नीलेश जी


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Comment by rajesh kumari on October 12, 2014 at 6:59pm

वाह्ह्ह्ह बच्चे की मासूमियत बहुत बड़ी बात कह गई ...गरीब के घर में तभी तो दिवाली आएगी जब उनके दीये बिकेंगे .बहुत सुन्दर कहानी लिखी है .हार्दिक बधाई आपको निलेश शर्मा जी |

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