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साँसों के संबंध का , बस इतना अनुवाद..............

धीरज धर कर जीवन को , पाला होता काश
पुष्प ना बनता मैं भले , बन ही जाता घास 

कितने जमनों का भँवर लिपटा मेरे पाव
धूप भी अब लगती सुखद जैसे ठंडी छाव

प्यासे को पानी मिले , गर भूखे को अन्न
हर गरीब हो जाए इस , धरती पे संपन्न

आकर बैठो पास में मेरे भी , कुछ वक़्त
आगे का लगता सफ़र होने को है सख़्त

मिला मुझे जैसा भी जो , स्वीकारा बे-खोट
इसलिए शायद हृदय , पाया मेरा चोट

नींदे जगती रात भर , सोते रहते ख़्वाब
भूल गयीं जैसे लगे , ये लंबा कोई हिसाब

ख़्वाबों का हो जाए भी , फिर चाहे अवसान
इक पल तेरी आँख में , मिल जाए स्थान

जीवन भर की दोस्ती , इक पल का संवाद
साँसों के संबंध का , बस इतना अनुवाद

अमुद्रित / अप्रकाशित
अजय क शर्मा
9415461125

Views: 600

Comment

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Comment by somesh kumar on November 2, 2014 at 9:24am

अच्छी कोशिश

Comment by ajay sharma on November 1, 2014 at 10:37pm

giriraj  ji apka kaha sir mathe ......follow avshya karoonga ....


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 1, 2014 at 8:38am

आदरणीय अजय भाई , बहुत जानदार बातें कही है आपने दोहों के माध्यम से , आपको बधाइयाँ । शिल्प के विषयमे आ. गोपाल भाई बता चुके हैं , जरूर ध्यान दीजियेगा ।

Comment by ajay sharma on October 30, 2014 at 10:46pm

pahli baar hi prayas kiya hai ...dohawali .....par ....adar. Dr. gopal ji ke sujhav par karya karoonga .....


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 30, 2014 at 9:22pm

बहुत सुन्दर प्रस्तुति आ० डॉ गोपाल नारायण जी के सुझाव ध्यातव्य हैं शिल्प पर सधकर उन्नत दोहावली निखर कर आएगी |बहुत बहुत बधाई आपको 

Comment by Saarthi Baidyanath on October 30, 2014 at 9:10pm

बढ़िया , छंद विधान की जानकारी तो मुझे भी नहीं है ! ... चलिए दोनों सीखते हैं ! बहुत बढ़िया प्रयास !

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 30, 2014 at 4:55pm

हर गरीब हो जाए इस , धरती पे संपन्न..>>>>>हर गरीब हो जाय इस  , धरती पर संपन्न >>>> ए  दो  मात्राये  हैं

मिला मुझे जैसा भी जो , स्वीकारा बे-खोट>>>> जो कोई जैसा मिला , स्वीकारा  बेखोट >>>>> विषम चरणान्त  222 नहीं होता

इसलिए शायद हृदय , पाया मेरा चोट>>>>>>इसीलिये मेरा हृदय , पाया शायद चोट >>>>>>विषम  चरण में 13 मात्राएँ चाहिए

भूल गयीं जैसे लगे , ये लंबा कोई हिसाब>>>>भूल गयी जैसे लगे , लम्बा एक हिसाब >>>>>> सम चरण में 11  मात्राये चाहिये

ख़्वाबों का हो जाए भी , फिर चाहे अवसान>>>ख़्वाबों का हो जाए फिर,भी  चाहे अवसान>>>विषम चरणान्त  222 नहीं होता

इक पल तेरी आँख में , मिल जाए स्थान>>>>>इक पल तेरी आँख में , मिल जाए यदि स्थान>>>सम चरण में 11  मात्राये चाहिये

जीवन भर की दोस्ती , इक पल का संवाद>>>जीवन भर की मित्रता  , इक पल का संवाद>>>>विषम चरणान्त  222 नहीं होता

ओ बो ओ साईट में समूह कें अंतर्गत  छंद विधान में दोहों का शिल्प उपलब्ध है i कृपया उसे पढ़े i  सस्नेह i

Comment by umesh katara on October 30, 2014 at 9:33am

वाहहह

कृपया ध्यान दे...

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