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लघुकथा : दृष्टिकोण (गणेश जी बागी)

"हेलो, हाँ डॉक्टर साहब ! नमस्कार, बिटिया की शादी का निमंत्रण कार्ड भिजवा दिया है, भाभी जी और बच्चो को लेकर अवश्य आइयेगा"

"जी भाई साहब, नमस्कार, कार्ड मिल गया है, श्रीमती जी बच्चो के साथ जायेंगी, मैं न आ सकूँगा, आपको तो पता ही है शहर में डायरिया फैला हुआ है"

"हां, वो तो है, पर आपकी भगिनी की शादी है, कमसे कम दो दिन का भी समय निकालिये"

"माफ़ी चाहूंगा भाई साहब, सीजन चल रहा है यही तो दो पैसे कमाने के दिन हैं"

(मौलिक व अप्रकाशित)

पिछला पोस्ट => लघुकथा : रुतबा

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 3, 2014 at 9:16pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर जी, सदैव की भाति आपकी टिप्पणी प्रोत्साहित करती है, हृदय से आभार स्वीकार करें।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 3, 2014 at 9:13pm

आदरणीय प्रधान संपादक श्री योगराज प्रभाकर जी, लघुकथा आपकी पारखी नज़रों से होकर सफलता पूर्वक गुजर गयी यह मेरे लिए दोहरी ख़ुशी की बात है, प्रोत्साहित करती टिप्पणी हेतु बहुत बहुत आभार।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 3, 2014 at 8:04pm

सच कहा सीजन के दिनों में (महामारी हो या एक्सीडेंट या प्राकृतिक आपदा  )डाक्टर्स की तो चाँदी होती है वो क्यूँ अपना नुक्सान करेंगे ...शानदार कटाक्ष करती हुई लघु कथा ,बहुत- बहुत बधाई आ० गणेश जी. 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on November 3, 2014 at 7:38pm

कम से कम शब्दों में लघुकथा के मर्म को उजागर कर देना ...यह आपके ही बस की बात है. हार्दिक अभिनन्दन आपका आदरणीय श्री बागी जी 

Comment by Dr. Vijai Shanker on November 3, 2014 at 7:33pm

" कमाने के दिन "उसके आगे तो सारे नाते-रिश्ते व्यर्थ हैं।
एक विचित्र सत्य का चित्रांकन करती है यह रचना।
बहुत बहुत बधाई आदरनीय इंजीo गणेश जी बागी जी।


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 3, 2014 at 3:13pm

सच है, भगवान का दूसरा रूप कहे जाने वाले डॉक्टर्स भी अब व्यवसायियों की तरह ही सोचने लगे हैं। लघुकथा सुन्दर हुई है, "सीज़न" शब्द को "डायरिया" का बाकमाल भी "कुशन" दिया है। हार्दिक बधाई स्वीकारें भाई गणेश बागी जी।

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