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कुर्सी वाले लोग

क्या क्या मँशा उनसे बैठे पाले लोग

क्या करते हैँ सत्ता के ठैले वाले लोग

 

यहाँ दिन भर खटकर  चुल्हा जलता

कुछ जनता की खाते बैठे ठाले लोग

 

सरकारेँ बनती पूँजीपतियोँ के पैसे से

ताकत वोट की समझेँ भोले-भाले लोग

 

कुछ सालोँ बाद हवा खुद बदलती है

बुझा पुरानी नई मशाल सँभालेँ लोग

 

कुर्सी पर बैठे लोगोँ के हैँ ऊँचे सपने

जनता को सपने बेचेँ कुर्सी वाले लोग

देश विदेश के दौरे  हैँ उनकी मजबूरी

टेक्स से खर्चा भरेँ मजदूरी वाले लोग

 

नेताओँ ने तो देश की डोर है सँभाली

अपना घर खुद सँभाले घर वाले लोग

"मौलिक व अप्रकाशित" 

मोहिन्दर कुमार

Views: 515

Comment

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Comment by Mohinder Kumar on November 10, 2014 at 11:48am
धन्यवाद योगराज जी, सोमेश जी, लक्ष्मण जी एँव अरुण जी.

गजल के मीटर पर शायद मेरी रचना पूरी तरह से खरी न उतरे.... बस मन को भावो को शब्दोँ मेँ पिरो कर परस्तुत किया है.

हौसला अफजाई के लिये आप सब का शुक्रिया.

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 10, 2014 at 11:22am

अच्छी ग़ज़ल हुई है आ० मोहिन्दर कुमार जी, बधाई स्वीकारें।

Comment by somesh kumar on November 9, 2014 at 5:09pm

सुंदर ,बधाई इस रचनाकर्म के लिए 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 8, 2014 at 6:35pm

यहाँ दिन भर खटकर  चुल्हा जलता

कुछ जनता की खाते बैठे ठाले लोग - बहुत खूब ! उम्दा गजल के लिए बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on November 7, 2014 at 10:53pm
आदरणीय मोहिंदर कुमार जी, सुन्दर गज़ल, बधाइयाँ.........

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