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तो फिर बात ही क्या थी

सफ़र तय किये हमने मोहब्बत में साथ चलकर
इश्क़ में बुने सपने तुम्हारे साथ जो मिलकर
हकीक़त हो गये होते ,तो फिर बात ही क्या थी
होते तुम हमारे साथ ,तो फिर बात ही क्या थी |

राह कांटों भरी मोहब्बत की फिर भी चल दिए हम तुम
मिले जो दर्द ज़माने से उसे भी सह लिए हम तुम
जहाँ देता न ये दर्द ,तो फिर बात ही क्या थी
होते तुम हमारे साथ ,तो फिर बात ही क्या थी |

तेरे ख्वाबों का वस्त्र धारण कर लिया मैंने
तेरी चाहत रूपी शस्त्र धारण कर लिया मैंने
स्वीकृत शस्त्र किया होता ,तो फिर बात ही क्या थी
होते तुम हमारे साथ ,तो फिर बात ही क्या थी |

कभी आंसूं ,कभी जहर,जब भी दिया तुमने
बिना सोचे समझे सब कुछ पी लिया हमने
अमर होते गरल पीकर ,तो फिर बात ही क्या थी
होते तुम हमारे साथ ,तो फिर बात ही क्या थी |

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 556

Comment

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Comment by maharshi tripathi on November 11, 2014 at 7:48pm

आप सभी का हार्दिक  अभिनन्दन |आशीर्वाद दे के इससे अच्छा लिख सकूं |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 11, 2014 at 8:56am

आ. त्रिपाठी जी , बढ़िया रचना हुई है , बहुत बहुत बधाइयाँ ।

Comment by maharshi tripathi on November 11, 2014 at 12:47am
आप सभी को स्नेह एवं प्यार देने के लिए ,सुक्रिया |

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 10, 2014 at 11:26am

बढ़िया रचना के लिये बधाई।

Comment by ram shiromani pathak on November 9, 2014 at 2:23pm

सुन्दर प्रस्तुति  आदरणीय  भाई //हार्दिक बधाई आपको 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 9, 2014 at 10:44am

तो फिर बात ही क्या थी का अंतिम बंद बहुत सुंदर बन पडा है -

कभी आंसूं ,कभी जहर,जब भी दिया तुमने
बिना सोचे समझे सब कुछ पी लिया हमने
अमर होते गरल पीकर ,तो फिर बात ही क्या थी
होते तुम हमारे साथ ,तो फिर बात ही क्या थी |------बहुत खूब | सुंदर रचना के लिए बधाई  

Comment by umesh katara on November 9, 2014 at 8:20am

waaaaaaah 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 8, 2014 at 5:44pm

सुन्दर रचना के लिये  बधाई i

कृपया ध्यान दे...

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