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एक नामी कॉलेज मेँ कोई मनचला एक लड़की के साथ बदतमीज़ी करने लगा और वो डरी सहमी होने के बाद भी विरोध करने का प्रयास कर रही थी, लेकिन नाकाम रही और वहाँ खड़े लोग मूकदर्शक बने तमाशे का आनन्द लेते रहे।
"ऐसे पचड़ोँ मेँ कोई भला क्यूँ पड़े?"
पर एक लड़के को जाने क्या पड़ी थी जो उस लड़के को पकड़कर एक थप्पड़ रसीद कर दिया। उस मनचले को ऐसा अप्रत्याशित व्यवहार असहनीय था। उसने झट से पलटवार किया। मामले को यूँ बढ़ता देख लोगोँ ने बीच-बचाव किया।

"आखिर इस दृश्य मेँ वह आनन्द कहाँ था?"
खैर, बला टली।

अगले दिन वो मनचला कुछ लड़कोँ के साथ आया और उस लड़के के साथ मारपीट करने लगा। थोड़ी देर मेँ उसके भी साथी आ गए। चूँकि दोनोँ लड़के अलग अलग धर्मोँ के थे तो जल्दी ही छोटी सी घटना ने हिन्दू-मुस्लिम झगड़े का रूप ले लिया। कॉलेज मेँ तोड़-फोड़ हुई। कुछ निर्दोष लोग ज़ख्मी हुए। अख़बारोँ मेँ सुर्खियाँ छपी। नेताओँ ने मामले कि निन्दा करते हुए जमकर भाषण दिए।

"पर कौन जाने वो लड़की हिन्दू थी या मुस्लिम?"

"पूजा"
"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by pooja yadav on December 11, 2014 at 12:14pm
जैसे ही समय मिलेगा मैँ इस रचना मेँ सुधार का प्रयास करूँगी आदरणीय योगराज जी।

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 10, 2014 at 10:51am

लघुकथा में निहित भाव सुन्दर हैं, लेकिन प्रस्तुति अभी काफी कमज़ोर है  प्रिय पूजा यादव जी।

//"आखिर इस दृश्य मेँ वह आनन्द कहाँ था?"
खैर, बला टली। //

बात कहने की यह शैली लघुकथा को ढीला बना रही है। सतत प्रयास और अभ्यास से लेखनी में निखार आएगा।

Comment by pooja yadav on December 6, 2014 at 8:14pm

sabhi aadarneey paathakjano ka saadar aabhaar..meri rachna par aap sabhi ki upasthiti ke liye dil se aabhaari hu

Comment by pooja yadav on December 6, 2014 at 8:12pm

ji aadarneey gopal shreevastv ji.............aapke maargdarshan ke liye hraday se aabhaari hu...........saadar aabhaar


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 6, 2014 at 3:58pm

आ. पूजा जी वर्तमान की ज्वलंत समस्या सुन्दर रचना हुई है , बधाइयाँ ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 3, 2014 at 7:25pm

पूजा जी

इन्सानियत  धर्म नहीं है I इंसानियत धर्म का अंग है i इसलिए वह धर्म से ऊपर नहीं है  i आपकी पंच लाइन हिन्दू मुसलिम की बात करती है इंसानियत की नहीं  I शीर्षक कथा का केन्द्रीय भाव होना चाहिए i इससे अधिक संक्षेप में इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता  i  आप स्वयं समझदार हैं I

Comment by pooja yadav on December 3, 2014 at 6:05pm
Aap sabhi aadarneey lekhakganno ke vicharon ka samaan karti hu. . . Aur meri rachna par aap sab ki maujoodgi ke liye dil se aabhaari hu. . .
Sachcha dharm insaaniyat ka maarg dikhaata hai. . Aisa hum padhte aaye h. . Aur yah bhi jaante h ki apne apne dharm ka anuyayi vyakti apne dharm ko hi shresth maanta aur bataata h. . Par jab baat kartvya paalan ki aati h to dharm to door insaaniyat tak bhool jaate h. . Dharm insaaniyat se upper nahi. . . Kya wo manchla, wo tamaasha dekhte log, bhed chaal ki tarah hindu musalmaan ke naam par jama hote log kya insaan kahlaane ke bhi yogya the. . ?
Mere vichaar se insaaniyat se bada dharm nahi. . Yahi se sheershak rakha h. .
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 3, 2014 at 12:37pm

सोमेश जी ने ठीक कहा शीर्षक कथा  के साथ न्याय नहीं करता  i कथा की अन्तिम पंक्ति  ही पंच लाइन है I

Comment by Dr. Vijai Shanker on December 2, 2014 at 8:05pm
अच्छी प्रस्तुति . मूल प्रश्न या समस्या को ज़िंदा रखने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि उसे ही उलझा दो। हम भी रोज यही करते हैं।
इस कहानी के लिए बधाई।
Comment by somesh kumar on December 2, 2014 at 7:18pm

कहानी का अंत शीर्षक से जुड़ता नहीं लग रहा |शायद शीर्षक बदलना चाहिए |इन्सान का धर्म ,सच्चा धर्म या सिर्फ धर्म ज्यादा मेल खाते हैं ,पर क्युकी कहानी इसी शीर्षक के साथ स्वीकार की गया है तो हो सकता है मेरा नजरिया अलग हो,बरहाल सुंदर प्रयास के लिए बधाई

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