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1222 1222 1222 1222

खबर ऐसी करे हैरान पेशावर से आयी है ।
कि बू हैवानियत की फिर पडोसी घर से आयी है ।

धर्म के नाम पर मासूम बच्चे भी नहीँ बख्शे ,
ये बरबरता तुम्हारे कौन से जौहर से आयी है ।

कत्ल इंसानियत का कर जिहादी पायेँगे जन्नत ,
भला तालीम ऐसी कौन पैगम्बर से आयी है ।

जो बोता था हमेशा से किसी के वास्ते काँटे ,
उसे ये चोट अपने ही उगाये खर से आयी है ।

संभल जा दूसरोँ पर नफरतोँ के वार करने से ,
कि अब तो दर्द की आवाज तेरे घर से आयी है ।

अमन तेरे वतन मेँ हो अमन सबके वतन मेँ हो ,
दुआ ये ही तेरे गम मेँ जमाने भर से आयी है ।

मौलिक व अप्रकाशित

नीरज मिश्रा

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Comment by Hari Prakash Dubey on December 20, 2014 at 6:54pm

बोके  बीज नफरत के कहाँ दामन बचाओगे। ...इस सार्थक ग़ज़ल पर बधाई नीरज जी !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 19, 2014 at 12:23am

समसामयिक मार्मिक ग़ज़ल ...

जो बोता था हमेशा से किसी के वास्ते काँटे ,
उसे ये चोट अपने ही उगाये खर से आयी है । उम्दा शेर आदरणीय नीरज जी 

Comment by pratibha tripathi on December 18, 2014 at 11:21pm

नीरज जी आपको इस रचना के लिए बधाई देती हूँ कि आपने न केवल दुख का अनुभव किया अपितु इस रचना के माध्यम से बताया है कि जो बोता है गर दाना कोई  तो अन्न पाओगे

बोके  बीज नफरत के कहाँ दामन बचाओगे। 

कि तुमने तो रुलाया है हमेशा ही गुलिस्ताँ को ,

जो घर कि आग मे जलजाए खुद ही कह न पाओगे ,

तुम्हें मालूम हो जाए कदर इंसानियत जब,

किसी रोते हुए बच्चे को  जब तुम  हंसाओगे । 

बहुत अच्छी मन तक पहुँचने वाली प्रस्तुति ,धन्यवाद आपका 

Comment by ajay sharma on December 18, 2014 at 10:57pm

bahut hi umda aur samyaik gazal kahi hai ......


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 18, 2014 at 8:00pm

समयानुकूल , बहुत मार्मिक गज़ल कही , आदरणीय नीरज प्रेम भाई , मेरी मी संवेदनायें शामिल कर रहा हूँ । रचना के लिये आपको बधाई ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 18, 2014 at 7:36pm

उस बर्बरता पूर्ण घटना को अच्छे अशआरों में बांधा है ...धर्म और कत्ल २१ मात्रा में आते हैं धरम और कतल लिखेंगे तो मेरे ख्याल से चलेगा ....बहुत बहुत बधाई इस ग़ज़ल पर 

संभल जा दूसरोँ पर नफरतोँ के वार करने से ,
कि अब तो दर्द की आवाज तेरे घर से आयी है ।--बहुत जबरदस्त शेर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 18, 2014 at 6:29pm

बहुत बढ़िया i पेशावर की घटना पर आपके त्वरित प्रक्रिया अभिभूत करती है i

Comment by gumnaam pithoragarhi on December 18, 2014 at 6:00pm

बहुत खूब प्रस्तुति............... पर जो हुआ वो इंसानियत का काम नहीं था वो काम हैवानों का था

Comment by Shyam Narain Verma on December 18, 2014 at 4:07pm

मार्मिक व लाजवाब प्रस्तुति के लिये बहुत बहुत बधाई स्वीकारेँ 

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