अतुकांत कविता : केसर के फूल
चौक गया
यह देखकर
स्कूल के फर्श पर
फैला गाढ़ा रंग
बिलकुल वैसा ही था
जैसा
कुछ वर्ष पहले था
मुंबई के प्लेटफॉर्म पर
कोई अंतर नहीं
एकदम सुर्ख़ लाल रंग
उपजाऊ भूमि
बो दिया बारूद
इस उम्मीद में
कि .........
केसर फूलेंगे ।
(मौलिक व अप्रकाशित)
पिछला पोस्ट => लघुकथा : सुकून
Comment
दर्द बोया उसने सुकून के लिए /
खून बहाया है बस खून के लिए
उसके जमीर के जागने की उम्मीद ना कर
वो मौत बांटता है बस जूनून के लिए |
सुंदर और सम्वेदना-पूर्ण एवं सार्थक तुलना करती हुई ,हृदय की एक सार्थक कविता
आदरणीया प्रतिभा त्रिपाठी जी, हम सभी एक दुसरे से सीखते रहते हैं यही इस साईट की खूबसूरती है और यही इसका उद्देश्य, आप उपस्थिति बनाये रखें, सब कुछ आसान सा लगने लगेगा . सराहना हेतु बहुत बहुत आभार .
प्रिय नीरज जी, जो कुछ लिखता हूँ सब ओ बी ओ और साथियों की कृपा है, आपको रचना पसंद आयी, मेरे लिए हर्ष का विषय है, दिल से आभार व्यक्त करता हूँ .
आदरणीय शिज्जू भाई, आपकी सराहना सदैव प्रोत्साहित करती है, बहुत बहुत आभार .
सुन्दर अभिव्यक्ति पर हार्दिक बधाई। |
आदरणीय डॉ विजय शंकर जी, आप की सराहना कविता को सार्थकता प्रदान कर गयी, बहुत बहुत आभार।
आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी, आपकी उत्साहवर्धन करती प्रतिक्रिया हेतु दिल से आभार, स्नेह बना रहे सादर।
आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी, आप तक यह कविता पहुँच सकी उसकी ख़ुशी है, सराहना हेतु हृदय से आभार।
-आ0 बागी जी
इस कविता में वैसा ही दंश जैसा आपकी लघु कथा में होता हैं -
बो दिया बारूद
इस उम्मीद में
कि .........
केसर फूलेंगे---------- लेखनी को नमन i
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