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दो नन्हें फूल,मेरे आँगन के

खिलते महकते,खुशियाँ जीवन के

लड़ते झगड़ते, कभी रुठ भी जाते

पल भर में फिर भूल भी जाते

भोली हँसी कोमल इनका मन है

इनकी बातो में झरते सुमन हैं

दुख का साया, इनके पास न आए

निर्मल धारा ये, बस बहते ही जाए

‘काशवी’ जीवन है तो,’दैविक’ वर है

इनसे ही तो बना ,मेरा घर , घर है

          ***********

काशवी’-प्रकाशवान

दैविक- ईश्वर का दिया वरदान

         **********

महेश्वरी कनेरी

मौलिक/ अप्रकाशित

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Comment

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Comment by harivallabh sharma on January 7, 2015 at 8:36pm

आदरणीया Maheshwari Kaneri जी बहुत सुन्दर रचना हुयी , हार्दिक बधाई,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 7, 2015 at 8:04pm

आदरणीया , बढिया रचना हुई है , बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Maheshwari Kaneri on January 7, 2015 at 6:23pm

आदरणीय मिथिलेश  जी,खुर्शीद जी,डा गोपाल नारायण जी और प्रकाश जी..उत्साहवर्धन के लिए आप सब का आभार

Comment by Hari Prakash Dubey on January 6, 2015 at 5:12pm

सुन्दर रचना आदरणीया  महेश्वरी कनेरी जी , शुभकामना के साथ सादर अभिनन्दन और बहुत बहुत बधाई !

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 6, 2015 at 3:31pm

आ0 कनेरी जी

काशवी  व् दैविक  को हमारा भी स्नेह i संयोग से मेरी बेटी का नाम  भी 'काशिका ' है i  सादर i

Comment by khursheed khairadi on January 6, 2015 at 10:52am

भोली हँसी कोमल इनका मन है

इनकी बातो में झरते सुमन हैं

आदरणीया माहेश्वरी जी , बहुत सुन्दर पंक्तिया हैं |सादर अभिनन्दन |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 5, 2015 at 9:05pm
आदरणीया माहेश्वरी कनेरी जी इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

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