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तू देव-रूप है मेरे लिए

तू देव रूप है मेरे लिए ---

मुझे तराशा  है तेरे प्यार ने

मुझपे ऐतबार कर

तू देव रूप है मेरे लिए,मेरी

पूजा स्वीकर कर

मैं तो दलदल था,कमल पुष्प

खिलाए तुमने मुझमें

मृत था मेरा ये उर

एहसास पुनः जगाए तमने मुझमें

उठ,खड़ी हो,मजबूत बन

अपनी कोशिश ना निराधार कर

तू देव रूप है मेरे लिए -----------

जब सारे ज़माने ने

मुझ से मुँह फेर लिया

जब सघन तिमिर ने

मुझ को घेर लिया

तुम आई मेरी ज़िन्दगी में

किरण का आधार बन

तू देव रूप है मेरे लिए -------------

माना मैंने तुझे गढ़ा

पर उससे पहले पढ़ा

तुम्हें रच मेरा यकीन जागा

तुम्हें देख किया पुनःप्रेम-ईरादा

तो उठ इस प्रेम का अब विस्तार कर

तू देव रूप है मेरे लिए -------------

माना बिछड़ना है हमारी तकदीर

पर क्यों मन को करती अधीर

पूर्णता कहाँ देता है प्रेम को साकार

तो चल इसे अब निराकार कर

तू देव रूप है मेरे लिए

.

सोमेश कुमार

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

 

 

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Comment

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Comment by somesh kumar on January 8, 2015 at 5:07pm

भाई लोगों का प्यार सिर-आँखों पर पर गुर-जनों का आशीष लेखन को एक नई शक्ति और नया चिंतन देता है |आप सभी के प्रेम और स्नेह के लिए थे दिल से बधाई |त्रुटी ईंगित करने के लिए गणेश सर आपका आभार ,आगे पूरी कोशिश रहेगी की ऐसी त्रुटियों से बचूं 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 7, 2015 at 9:03pm

आ. सोमेश भाई , सुन्दर भावपूर्ण रचना के लिये आपको हार्दिक बधाई ।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 7, 2015 at 1:47pm

//

एहसास पुनः जगाए तमने मुझमें

उठ,खड़ी हो,मजबूत बन

अपनी कोशिश ना निराधार कर//

सुन्दर अभिव्यक्ति, बधाई सोमेश जी.

Comment by Dr. Vijai Shanker on January 7, 2015 at 5:32am
सुन्दर, प्लेटोनिक , बधाई , आदरणीय सोमेश जी, सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 6, 2015 at 10:33pm
सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 6, 2015 at 7:40pm

सोमेश जी

प्यार दोनों पक्षो को सवारता है i आपने सही लिखा - माना मैंने तुझे गढा i  पर उससे पहले तुम्हे पढा i मुझे अपना एक गीत याद आ गया-

प्रिय दर्शन हो तो इससे क्या , मैंने तुमको प्यार बनाया

तुममे जो था शांत उसी को आलंबन शृंगार बनाया i

            मेरे मन की रस गंगा हो जाकर सागर में मिल जाना

            मैं जी लूँगा साथी मेरे पर तुम मुझको याद न आना

Comment by Hari Prakash Dubey on January 6, 2015 at 5:10pm

बेहतरीन सोमेश भाई, बस थोडा और प्रवाह लाना है ,हार्दिक बधाई !

Comment by maharshi tripathi on January 6, 2015 at 5:05pm

सुन्दर रचना |

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