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आज नायक भी यहाँ पर - ग़ज़ल ( लक्ष्मण धामी ' मुसाफिर' )

2122 2122 2122 212

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अजनवी  सी  सभ्यता के बीज बोकर रह गए
सोचकर अपना, किसी का बोझ ढोकर रह गए

***
वक्त  सोने  के  जगा करते हैं देखो यार हम
जागने  के  वक्त लेकिन रोज सोकर रह गए

***
लोरियाँ माँ की, कहानी  नानियों की, साथ ही
चाँद तारे , फूल, तितली लफ़्ज होकर रह गए

***
कसमसाकर  दिल जो खोले है पुरानी पोटली
याद कर बचपन  को यारो नैन रोकर रह गए

***
मानता हूँ , है  हसोड़ों  की जरूरत, दुख मगर
आज नायक भी यहाँ पर हो के जोकर रह गए

***
राजनेता  खा  रहे  बादाम-विश्की  मुफ्त  में
मोल को जनता के हिस्से सिर्फ चोकर रह गए

***
पीठ  पीछे  तो गरजते  खूब  तुम ‘नापाक वो’
सामना  होते  ही  लेकिन पाँव धोकर रह गए

***

रचना - 15 दिसम्बर 14
मौलिक और अप्रकाशित

Views: 679

Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 9, 2015 at 11:24am

आदरणिया भाई खुर्शीद जी , ग़ज़ल पर बधाई प्रेषित करने के लिए आभार .जहाँ तक नये प्रयोग की बात है आप सभी का स्नेह और प्रेरणा कुच्छ ना कुछ नया सोचने को प्रेरित करती है . ओ बी ओ पर सुधार की पूरी गुंजाईस रहती है इसलिए भी नये प्रयोग करते समय संकोच नहीं रहता . स्नेह बनाएँ रखें .

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 9, 2015 at 11:13am

आदरणिया भाई गुमनाम जी , ग़ज़ल पर बधाई प्रेषित करने के लिए आभार .

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 9, 2015 at 11:11am

आदरणिया भाई हरी प्रकाश ग़ज़ल की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 9, 2015 at 11:10am

आदरणिया भाई मिथिलेश जी , ग़ज़ल पर स्नेहपूरित बधाई प्रेषित करने के लिए आभार .

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 9, 2015 at 11:07am

आदरणिया भाई गोपाल नारायण आपका अनुमोदन पाकर लेखन सफल हुआ हार्दिक धन्यवाद.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 9, 2015 at 11:05am

आदरणिया भाई सोमेश जी , ग़ज़ल पर बधाई प्रेषित करने के लिए हार्दिक धन्यवाद .

Comment by khursheed khairadi on January 9, 2015 at 11:05am

राजनेता  खा  रहे  बादाम-विश्की  मुफ्त  में
मोल को जनता के हिस्से सिर्फ चोकर रह गए

आदरणीय मुसाफ़िर साहब कहन और काफ़िये के हिसाब से भी बिलकुल नया  प्रयोग है, बधाई |सादर अभिनन्दन | 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 9, 2015 at 11:04am

आदरणिया भाई गिरिराज जी , ग़ज़ल की प्रसंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद .

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 9, 2015 at 11:03am

आदरणिया भाई सुशील सरना  जी आपको ग़ज़ल अच्च्ची लगी यह मेरे लिए हर्ष का विषय है हार्दिक धन्यवाद.l

Comment by gumnaam pithoragarhi on January 8, 2015 at 9:23pm

वाह सर कमाल ग़ज़ल हुई हर शेर लाजवाब

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