For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

युग्मों का गुलदस्ता …

युग्मों का गुलदस्ता …


एक  पाँव  पे  छाँव  है  तो  एक  पाँव  पे   धूप
वर्तमान  में  बदल  गया  है  हर रिश्ते का रूप


अब  मानव  के  रक्त  का  लाल  नहीं   है   रंग
मौत  को  सांसें  मिल  गयी  जीवन हारा  जंग


निश्छल प्रेम अभिव्यक्ति के बिखर गए हैं पुष्प
अब  गुलों  के  गुलशन  से  मौसम  भी  हैं रुष्ट


तिमिर  संग  प्रकाश  का  अब  हो गया  है मेल
शाश्वत  प्रेम अब बन गया है शह मात का खेल


नयन  तटों  पर  अश्रु  संग  काजल  करे पुकार
पिया  मिलन  को  धधक  रहे  अधरों पे  अंगार

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 687

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Sushil Sarna on January 10, 2015 at 1:01pm

आदरणीय    gumnaam pithoragarhi   जी युग्मों पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on January 10, 2015 at 1:01pm

आदरणीय   Dr Ashutosh Mishra  जी युग्मों पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on January 10, 2015 at 1:00pm

आदरणीय  डॉ गोपाल नरायन श्रीवास्तव   जी युग्मों पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार। सर मैंने ये युग्म दोहे की विधा में नहीं लिखे अन्यथा मैं इसे युग्म न कहकर दोहे ही कहता।  ये स्वतंत्र विचारों के  स्वतंत्र युग्म हैं बस विचार आते गए और लिखता गया। दोहे लिखता तो उसकी नयमावली की परिधि में ही लिखता।  आपके विचारों का हार्दिक आभार सर जी।  

Comment by Sushil Sarna on January 10, 2015 at 12:56pm

आदरणीय   Shyam Narain Verma   जी युग्मों पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by ajay sharma on January 9, 2015 at 10:42pm

तम के   संग  प्रकाश  का   अभी हुआ  है मेल 
प्रेम शाश्वत  बन गया   शह-ओ- मात का खेल............"shah-au-maat"  ke esthan par 

prem shashvat ban gaya , har jeet ka khel.............zyada better lagta hai ...geyta bhi aa jayegi ...........


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 9, 2015 at 9:36pm

आदरणीय सरना जी सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई

Comment by gumnaam pithoragarhi on January 9, 2015 at 6:38pm

वाह बहुत सुन्दर, प्रस्तुति के लिए बधाई

Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 9, 2015 at 4:58pm

आदरणीय सरना जी ..सुंदर भावों को समाहित किये इन समस्त दोहों के लिए तहे दिल बधाई .सादर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 9, 2015 at 3:59pm

 आ  0 सरना जी

अच्छे भावों से भरी इस दोहावली में शिल्पगत कुछ सुधार अपेक्षित है -

एक  पाँव  पे  छाँव  है       एक  पाँव  पे   धूप 
बदल  गया  है आजकल    हर रिश्ते का रूप   


अब  मानव  के  रक्त  का  लाल  नहीं   है   रंग
सांस मौत  को  मिल  गयी     जीवन हारा  जंग


निश्छल हर  अभिव्यक्ति से    जग होता है तुष्ट  
अब गुलशन से गुलो से       मौसम  भी  हैं रुष्ट


तम के   संग  प्रकाश  का   अभी हुआ  है मेल 
प्रेम शाश्वत  बन गया   शह-ओ- मात का खेल


नयनन  तट  पर  अश्रु  संग  काजल  करे पुकार
पिया  मिलन  को  धधकते   अधरों पर  अंगार

Comment by Shyam Narain Verma on January 9, 2015 at 1:19pm
सुंदर रचना के लिए बहुत बधाई सादर

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
21 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Thursday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Thursday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service