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भूमिका(कविता)

अश्रु-पूरित चन्दन से भी

अगर टीकूँ|

है असम्भव अब तुम्हारा

लौट आना||

मैं इस मंच पर अभी कुछ

और खेलूँगा|

तुमकों जो अभिनय जँचे

तो मुस्काना ||

था टिका सम्बन्ध जिस पर

घुना वो आलम्ब|

हो सके तो उसपे कुछ

रेह लगाना||

हो सघन  तिमिर जब कोई  

राह ना सूझे|

तुम करना मेरा पथ-प्रशस्त

टिमटिमाना |

सोमेश कुमार(मौलिक एवं अप्रकाशित)     

 

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Comment

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Comment by asha pandey ojha on January 14, 2015 at 4:58pm

आदरणीय सोमेश कुमार जी  बहुत शानदार कविता है बधाई स्वीकारें

Comment by somesh kumar on January 14, 2015 at 2:46pm

शुक्रिया ,साहित्य के सभी मर्मज्ञों और अभिन्न मित्रों एवं गुरुओं जनों का ,पथ-प्रशस्त करने एवं सराहना 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on January 13, 2015 at 9:06pm

अच्छी रचना आदरणीय सोमेश कुमार जी  

Comment by Hari Prakash Dubey on January 12, 2015 at 5:05pm

हो सघन  तिमिर जब कोई 

राह ना सूझे|

तुम करना मेरा पथ-प्रशस्त

टिमटिमाना |......सुन्दर , सोमेश भाई हार्दिक बधाई !

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 12, 2015 at 3:26pm

उत्तम प्रयास i  ना उम्मीदी भी और चाह भी i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 12, 2015 at 8:39am

आदरणीय सोमेश भाई जी सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई .... खूब अच्छा लिखा है -

अश्रु-पूरित चन्दन से भी अगर टीकूँ

है असम्भव अब तुम्हारा लौट आना............ कमाल 

मैं इस मंच पर अभी कुछ और खेलूँगा

तुमकों जो अभिनय जँचे तो मुस्काना

था टिका सम्बन्ध जिस पर घुना वो आलम्ब

हो सके तो उसपे कुछ रेह लगाना.................. वाह 

हो सघन  तिमिर जब कोई  राह ना सूझे

तुम करना मेरा पथ-प्रशस्त टिमटिमाना........... बेहतरीन 

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