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"उतारो कपड़े इसके , देखो किस तरफ का है " , भीड़ चिल्ला रही थी और वो थर थर काँप रहा था | शहर में अचानक दंगा भड़क उठा था और वो भाग रहा था कि किसी तरह अपने घर पहुँच जाए | लेकिन जैसे ही एक मोहल्ले में घुसा , सामने से आ रही भीड़ ने उसे घेर लिया |
अभी वो कपड़ा उतारने ही जा रहा था कि पुलिस की गाड़ी के सायरन की आवाज आई और भीड़ भाग खड़ी हुई | अब वो पुलिस की जीप में बैठा सोच रहा था कि आज वो तो नंगा होने से बच गया , लेकिन इंसानियत नंगी हो गयी |

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मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on January 21, 2015 at 9:30pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय गुमनाम पिथौरागढ़ी जी..

Comment by विनय कुमार on January 21, 2015 at 9:30pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी..

Comment by gumnaam pithoragarhi on January 21, 2015 at 9:04pm
वाह सर जी वाह क्या गूड दृष्टि पाई है सर वाह बहुत खूब

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 21, 2015 at 8:59pm

दंगाइयों के पास इंसानियत कहाँ रह जाती है ,सच्ची घटनाओं पर आधारित इस लघु कथा के लिए बहुत बहुत बधाई 

Comment by Hari Prakash Dubey on January 21, 2015 at 8:29pm

आदरणीय विनय जी बहूत खूब ,सुन्दर लघुकथा !

Comment by विनय कुमार on January 21, 2015 at 6:16pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी..

Comment by विनय कुमार on January 21, 2015 at 6:16pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय जितेन्द्र पस्टारिया जी..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 21, 2015 at 5:33pm
आदरणीय विनय जी सफल लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई।
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 21, 2015 at 3:42pm

बेहतरीन लघुकथा. बधाई आदरणीय विनय जी

Comment by विनय कुमार on January 21, 2015 at 3:10pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय कांता रॉय जी |

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