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जिन्दा रखना - लघुकथा

सुकन्या भारतीय वायुसेना में नौकरी के पहले दिन तैयार होते ही भागी भागी आयी और अपनी माँ मधु को एक सैल्यूट करते हुए कहा, "माँ देखो, तुम्हारा सपना, तुम्हारे सामने| अब और क्या चाहिये तुम्हे?"

मधु की आखों में चमक के साथ साथ आंसू भी आ गये| उसने कहा, "एक वादा और चाहिये, बेटे| यदि तेरे भी बेटी हुई और तेरा पति और सास उसकी हत्या करने की कोशिश करे, तो तू मेरे जैसे अपनी बेटी को लेकर भाग मत आना| तेरी बेटी की रक्षा करने का कोई न कोई तरीका तुझे तेरे अफसर सिखा ही देंगे|"

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by vandana on February 3, 2015 at 7:30am

खूबसूरत सन्देश आदरणीय 

Comment by kanta roy on February 2, 2015 at 11:44am
बेहतरीन कथा के लिए बहुत बहुत बधाई आ. चंद्रेश जी
Comment by shalini kaushik on February 1, 2015 at 10:37pm
very nice .

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 1, 2015 at 12:24pm

बहुत सुंदर, प्रेरणादायक, सकारात्मक लघुकथा हेतु बधाई आदरणीय चंद्रेश जी.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on February 1, 2015 at 9:04am

बहुत सार्थक लघुकथा है चंद्रेश जी बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by विनय कुमार on February 1, 2015 at 12:45am

एक सकारात्मक लघुकथा हेतु बधाई आदरणीय चंद्रेश कुमार छतलानी जी..

Comment by vijay on January 31, 2015 at 10:47pm
बेहतरीन गद्य
Comment by विनोद खनगवाल on January 31, 2015 at 5:56pm
माँ की भावनाओं को बहुत ही सादगी से उकेरा है। बेटी को मारने वाले ज्यादा और बचाने वाले कम हैं। बधाई स्वीकारें आदरणीय चंद्रेश जी।
Comment by Shyam Mathpal on January 31, 2015 at 2:54pm

Aadarniya chandresh ji,

Prenadayak rachna ke liye badhai. Aaj Soch badalne ki jarurat hai.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 31, 2015 at 12:16pm

बहुत सुंदर, प्रेरणादायक लघुकथा आदरणीय चंद्रेश जी. हार्दिक बधाई स्वीकारें

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