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" व्यर्थ का अचंभा " अतुकांत -- गिरिराज भंडारी

व्यर्थ का अचंभा

***************

अचंभित न होइये

आपके ही माउस के किसी क्लिक का परिणाम है

आपके कंप्यूटर स्क्रीन पर आई ये फाइल

गलती कंप्यूटर से हो नहीं सकती ,

कंप्यूटर ही गलत , बिग़ड़ा चुन लिया हो तो और बात

अगर ऐसा है तो,

इस ग़लत चुनाव का कारण भी आप ही हैं

कंप्यूटर सदा से निर्दोष है, और रहेगा

 

फाइल खुलने में देरी- जलदी हो सकती है

कंप्यूटर की शक्ति, प्रोसेसर , रेम , हार्डडिस्क के अनुपात में

लेकिन ये तय है ,

परिणाम आपके ही किसी क्लिक का है

 

एक और कंप्यूटर है , ईश्वरीय  

कभी न खराब होने वाला

असीम अनंत शक्ति शाली प्रोसेसर , रेम और हार्डडिस्क वाला

ग़लती की रंच मात्र भी संभावना नहीं ,

कोई फाइल कभी करप्ट नहीं होती, बस  

किसकी कौन सी फाइल कब और कैसे खोलना

ये ईश्वराधीन है

 

वर्तमान में

जीवन के पटल पर उभर आईं परिस्थितियाँ

अच्छी हों या बुरी

आपके ही किसी क्लिक का परिणाम हैं

अचंभित न होइये,

अगर बुरी है   

पढ लीजिये खुली हुई फाइल

गुज़र जाने दीजिये

अनुभव बन कर इस समय को / फाइल को

ताकि वही क्लिक आप फिर न करें

दूसरी बार ,बार बार ।  

****************

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 4, 2015 at 7:41am

आदरणीय विजय भाई , आपकी सराहना ने मेरा लेखन क्र्म सार्थक कर दिया ! आपका दिल से आभारी हूँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 4, 2015 at 7:40am

आदरणीय सुशील भाई , आपकी स्नेहिल सराहना के लिये  हृदय से आपका आभारी हूँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 4, 2015 at 7:38am

आदरणीय हरि प्रकाश भाई , हौसला अफज़ाई के लिये आपका दिली शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 4, 2015 at 7:37am

आदरणीय मिथिलेश भाई , आपकी सराहना सदा और लिखने के लिये प्रेरित करती है । उत्साह वर्धन के लिये आपका आभार ।

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 3, 2015 at 11:47pm
वाह, कर्मों के फल का ऐसा यथार्थवादी , वैज्ञानिक चित्रण, वाह, बहुत ही सुन्दर, बहुत बहुत बधाई , आदरणीय गिरिराज भंडारी जी, सादर।
Comment by savitamishra on February 3, 2015 at 10:55pm

बहुत खुबसूरत .._/\_आदरणीय

Comment by Sushil Sarna on February 3, 2015 at 8:55pm

वर्तमान में
जीवन के पटल पर उभर आईं परिस्थितियाँ
अच्छी हों या बुरी
आपके ही किसी क्लिक का परिणाम हैं
अचंभित न होइये,
अगर बुरी है
पढ लीजिये खुली हुई फाइल
गुज़र जाने दीजिये
अनुभव बन कर इस समय को / फाइल को
ताकि वही क्लिक आप फिर न करें
दूसरी बार ,बार बार ।

वाह आदरणीय वाह … तकनीकी बदलाव को मानवीय भावों के साथ जोड़ एक शानदार दार्शनिक भाव को आपने जन्म दिया है। एक यथार्थ का सुंदर चित्रण करती इस मनमोहक प्रस्तुति के लिए हार्दिक हार्दिक बधाई और आपकी लेखनी और सोच को सलाम।

Comment by Hari Prakash Dubey on February 3, 2015 at 8:23pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी सर बहुत ही सुन्दर,...... /किसकी कौन सी फाइल कब और कैसे खोलना

ये ईश्वराधीन है/.....इस सुन्दर दर्शन ,संदेशप्रद रचना पर हार्दिक बधाई ! सादर   


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 3, 2015 at 6:17pm

वाह वाह वाह ... जीवन की सूचना प्रौद्योगिकीय व्याख्या... क्या बात है आदरणीय गिरिराज सर.. एक बार में पूरी कविता पढ़ गया.. फिर बार बार पढ़ता रहा. कर्म-फल के सिद्धांत को खूब सुन्दर तरीके से अभिव्यक्त किया है. रचना सीख भी दे रही है, जीवन के सभी पक्षों को अभिव्यक्त भी कर रही है और भाषा इतनी जीवंत है कि बस पाठक मुग्ध हो जाता है. बहुत बहुत बधाई इस बेहतरीन रचना के लिए लिए. 

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