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बसर तो प्यार से करते - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

1212   1122  1212     22

***************************

किरन की साँझ पे यल्गारियाँ नहीं चलती
तमस  की  भोर पे हकदारियाँ नहीं चलती

**

बचाना  यार  चमन बारिशें भी गर हों तो
हवा की आग से कब यारियाँ नहीं चलती

**

बसर तो प्यार से करते वतन में हम  दोनों
धरम  के नाम की गर आरियाँ  नहीं चलती

**

चले वही जो करे जाँनिसार खुश हो के
वतन की राह में गद्दारियाँ नहीं चलती

**

बने हैं संत ये बदकार मिल रही इज्जत
कहूँ ये कैसे कि बदकारियाँ नहीं चलती

**

नगर तो सबको है मालूम खत नहीं लिखता
मगर क्यूँ  गाँव  में  हलकारियाँ नहीं चलती

******

यल्गारी - आक्रमण, बदकार-चरित्रहीन,
बदकारी-चरित्रहीनता

**************************************

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 836

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Comment by somesh kumar on February 9, 2015 at 11:02pm

बसर तो प्यार से करते वतन में हम  दोनों
धरम  के नाम की गर आरियाँ  नहीं चलती

**

बने हैं संत ये बदकार मिल रही इज्जत
कहूँ ये कैसे कि बदकारियाँ नहीं चलती

वाह सर जी ,आज की हकीकत को कितनी सटीकता से बयान किया आपन ने ,पूरी गज़ल अच्छी पर ये शे'र विशेष बधाई 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 8, 2015 at 9:10pm

बसर तो प्यार से करते वतन में हम  दोनों
धरम  के नाम की गर आरियाँ  नहीं चलती..................पूरी तरह सहमत हूँ 

बने हैं संत ये बदकार मिल रही इज्जत
कहूँ ये कैसे कि बदकारियाँ नहीं चलती...........आज कल ऐसा ही हो रहा है सही बात है और इनसे कुछ कह पाने की सामर्थ्य भी किसी में नहीं है  आदरणीय लक्ष्मण जी ..इस शानदार ग़ज़ल के लिए ढेरों बधाई स्वीकार करें .सादर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 8, 2015 at 6:28pm


आ0 भाई अरूण जी, आप गजल को एक ही सास में पढ़ गये यानी गजल आपको बाधने में सफल हुई । आपको गजल इतनी भाई इससे लेखन सफल हुआ । स्नेह बनाए रखें .........

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 8, 2015 at 6:28pm


आ0 भाई गिरिराज जी, स्नेहाशीष के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 8, 2015 at 6:27pm


आ0 भाई हरिप्रकाश जी, गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 8, 2015 at 6:27pm


आ0 भाई समर जी, उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 8, 2015 at 6:27pm


आ0 भाई अजय शर्मा जी, गजल की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 8, 2015 at 6:27pm

आ0 भाई मिथिलेश जी, तब तो वास्तव में बड़ी गड़बड़ हो गयी । नये सिरे से कुछ सोचना पड़ेगा । खैर आप सभी को गजल पसंद आयी । यह मेरे लेखन का उद्देश्य पूरा हुआ । गजल पर उपस्थिति के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by khursheed khairadi on February 8, 2015 at 6:00pm

बचाना  यार  चमन बारिशें भी गर हों तो
हवा की आग से कब यारियाँ नहीं चलती

**

बसर तो प्यार से करते वतन में हम  दोनों
धरम  के नाम की गर आरियाँ  नहीं चलती

आदरणीय , लक्ष्मण साहब उम्दा ग़ज़ल हुई है |सादर अभिनन्दन |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on February 8, 2015 at 10:46am

आदरणीय लक्ष्मण धामी  जी...........बस एक साँस में गज़ल पढ़ गया. शुरू से अंत तक बेहतरीन ...

बसर तो प्यार से करते वतन में हम  दोनों
धरम  के नाम की गर आरियाँ  नहीं चलती..........बहुत खूब....

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