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भंग न तुम्हारा मौन हुआ

तुम साहसी हो,

मैं यह मानकर चला,

इसी  भाव  को,

हृदय में धारण कर,

प्रेम पथ पर आगे बढ़ा,

भावी जीवन का स्वप्न सजोयें,

परिवार, समाज, दुनिया से लड़ा,

पर देखो आज शर्मिन्दा खड़ा हूँ ,

स्वयं की नजरों में गिरा पड़ा हूँ ,

मुझे प्यार किया तुमने, पर कह ना सकीं,

मेरा जीवन होम हुआ, पर भंग न तुम्हारा मौन हुआ !!

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by umesh katara on February 15, 2015 at 4:02pm

वाहह सर अतिसुन्दर

मेरा जीवन होम हुआ, पर भंग न तुम्हारा मौन हुआ !!

 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 15, 2015 at 3:21pm

मेरा जीवन होम हुआ, पर भंग न तुम्हारा मौन हुआ !!

बहुत सुन्दर, जिन्दगी बीत जाती है, दिल की बात व्यक्त हो न पाती है और जब व्यक्त होती है तब तलक जिन्दगी का ऊंट करवट बदल चूका होता है. सुन्दर रचना आदरणीय हरिप्रकाश जी.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 15, 2015 at 3:03am

अच्छी अभिव्यक्त.... सुन्दर ... प्रस्तुति हेतु बधाई 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 14, 2015 at 8:46pm

एक मौन से हो जाते है     प्रायः जीवन नष्ट 

चुप रहने वालो को होता किन्तु नहीं है कष्ट --------- अच्छी अभिव्यक्ति i सुन्दर i

Comment by maharshi tripathi on February 14, 2015 at 8:18pm

सही कहा आ. विजयशंकर जी आपने बड़ी ही सरलता से बयां किया है आ.हरी प्रकाश जी ,,आपको सुभकामनायें |

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 14, 2015 at 9:07am
यह विवशता तो अक्सर होती है, बहुत सहज सरल ढंग से आपने बयान कर दी , आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी, बहुत बहुत बधाई इस सात्विक, यथार्थवादी रचना पर, सादर।

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