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तुझे वो याद करके दिल जलाती है चले आओ

तड़प कर गीत वो गम के सुनाती है चले आओ

बुलाती हैं तुझे हरदम तुम्‍हारे गॉंव की गलियॉं

तुम्‍हें वो याद करके अश्‍क बहाती है चले आओ

न भूलेगीं कभी गलियॉं शरारत याद है तेरी

कसम तुमको शरारत की दिलाती है चले आओ

जले है हाथ फिर भी सेकती रोटी तुम्‍हारी मॉं

तुम्‍हारा नाम ले ले वो बुलाती है चले आओ

न सुख मिलता यहॉं शहरी न बिजली है न बत्‍ती है

मगर खुद चॉंदनी रस्‍ता दिखाती है चले आओ

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 5, 2015 at 10:28pm

अखंड जी

उस्तादों की इस्लाह के बाद  गजल और् निखरी है i सादर i

Comment by Hari Prakash Dubey on March 5, 2015 at 10:24pm

आदरणीय अखंड गहमरी जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति है 

जले है हाथ फिर भी सेकती रोटी तुम्‍हारी मॉं

तुम्‍हारा नाम ले ले वो बुलाती है चले आओ....वाह , बहुत - बहुत बधाई आपको ! सादर 

Comment by gumnaam pithoragarhi on March 4, 2015 at 6:10pm

जले है हाथ फिर भी सेकती रोटी तुम्‍हारी मॉं

तुम्‍हारा नाम ले ले वो बुलाती है चले आओ

बहुत ही मनमोहक और सुन्दर ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई

Comment by Pari M Shlok on March 4, 2015 at 1:43pm
वाह जवाब नहीं .... कमाल की प्रस्तुति चले आओ
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 4, 2015 at 11:35am

क्या बात है...दिल बाग़ बाग़ हो गया !

न भूलेगीं कभी गलियॉं शरारत याद है तेरी

कसम तुमको शरारत की दिलाती है चले आओ

बहुत सुन्दर !!

जले है हाथ फिर भी सेकती रोटी तुम्‍हारी मॉं

तुम्‍हारा नाम ले ले वो बुलाती है चले आओ

लाजवाब!!

न सुख मिलता यहॉं शहरी न बिजली है न बत्‍ती है

मगर खुद चॉंदनी रस्‍ता दिखाती है चले आओ

बहुत ख़ूब! चॉंदनी रस्‍ता दिखाती है चले आओ!! क्या तरन्नुम है!

बहुत बहुत बधाई!! सादर! आज का दिन खुशनुमा बना दिया आपने!

Comment by Shyam Narain Verma on March 4, 2015 at 9:51am
उम्दा गज़ल के लिए ढेरों मुबारकबाद ....
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 4, 2015 at 4:11am
सुन्दर प्रस्तुति पर बधाई आदरणीय अखंड गहमरी जी, सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 3, 2015 at 9:24pm

वाह वाह वाह आदरणीय अखंड जी बहुत ही मनमोहक और सुन्दर ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई निवेदित है 

सभी अशआर मुग्ध कर रहे है, इन्हें गुनगुनाकर झूम गया हूँ 

जहाँ गुनगुनाने में ज़रा सी खलल का अहसास हो रहा है यानी जहाँ लयात्मकता बाधित लगी उसे इंगित कर रहा हूँ -

बुलाती हैं तुझे हरदम तुम्‍हारे गॉंव की गलियॉं

तुम्‍हें वो याद कर आँसू बहाती है चले आओ (करके अश्क के स्थान पर)

जले है हाथ फिर भी सेकती रोटी तुम्‍हारी मॉं

तुम्‍हारा नाम ले लेकर  बुलाती है चले आओ (वो के स्थान पर )

न सुख मिलता यहॉं शहरी न बिजली है न बत्‍ती है......... ( बिजली और बत्ती एक ही बात  ध्वन्यार्थ हो रही है यदि एक नया शब्द आ जाए तो और भी  अच्छा लगेगा.)

मगर खुद चॉंदनी रस्‍ता दिखाती है चले आओ...... बहुत उम्दा अशआर 

झूम कर गुनगुनाने वाली सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति हेतु हार्दिक आभार 

Comment by umesh katara on March 3, 2015 at 9:23pm

बुलाती हैं तुझे हरदम तुम्‍हारे गॉंव की गलियॉं

तुम्‍हें वो याद करके अश्‍क बहाती है चले आओ
वाहहहहहहहहहह

Comment by somesh kumar on March 3, 2015 at 7:59pm

शहर में जा बसी नई पीढ़ी को पुनः अपने आंचल में समेटने को आतुर गाँव की पुकार को सुंदर अभिव्यक्ति दी है |सद्प्रयास पर बधाई |

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