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बह्र : २२ २२ २२ २

शास्त्र पढ़े विज्ञान पढ़ा
कब तुमने इंसान पढ़ा

बस उसका गुणगान पढ़ा
कब तुमने भगवान पढ़ा

गीता पढ़ी कुरान पढ़ा
कब तुमने ईमान पढ़ा

कब संतान पढ़ा तुमने
बस झूठा सम्मान पढ़ा

जिनके थे विश्वास अलग
उन सबको शैतान पढ़ा

जिसने सच बोला तुमसे
उसको ही हैवान पढ़ा

सूरज निगला जिस जिस ने
उस उस को हनुमान पढ़ा
---------
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 12, 2015 at 3:51pm

बहुत बहुत शुक्रिया  Shyam Mathpal जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 12, 2015 at 3:51pm

आदरणीय गोपाल नारायन जी, इस बह्र में यदि लय भंग न हो तो २२२ को १२१२ भी लिया जा सकता है। अतः मिसरा बह्र से बाहर नहीं है। ग़ज़ल पसंद करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 12, 2015 at 3:49pm

बहुत बहुत शुक्रिया  maharshi tripathi  जी

Comment by Hari Prakash Dubey on March 12, 2015 at 2:17pm
आदरणीय धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी बहुत सुन्दर !
शास्त्र पढ़े विज्ञान पढ़ा
कब तुमने इंसान पढ़ा...वाह , बधाई आपको इस रचना पर ! सादर
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 12, 2015 at 11:29am

जिनके थे विश्वास अलग
उन सबको शैतान पढ़ा

बस उसका गुणगान पढ़ा
कब तुमने भगवान पढ़ा

इस लाजवाब रचना के लिए कोटि कोटि बधाई ...आ० भाई धर्मेन्द्र जी .

Comment by khursheed khairadi on March 12, 2015 at 9:13am

कब संतान पढ़ा तुमने
बस झूठा सम्मान पढ़ा

जिनके थे विश्वास अलग
उन सबको शैतान पढ़ा

आदरणीय धर्मेंदर जी ,उम्दा ग़ज़ल हुई है |ढेरों बधाई स्वीकार करें |सादर अभिनन्दन |

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on March 12, 2015 at 5:53am

वाह..... शास्त्र पढ़े विज्ञान पढ़ा .... कब तुमने इंसान पढ़ा.... बहुत ख़ूब.... सादर 

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 12, 2015 at 5:12am
सुन्दर एवं प्रभावशाली , बहुत बहुत बधाई , आदरणीय धर्मेन्द्र कुमारर जी , सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 12, 2015 at 5:04am

आदरणीय धर्मेन्द्र जी छोटी बह्र की बेहतरीन ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई निवेदित है 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 11, 2015 at 10:21pm

सुन्दर गजल के लिए दाद! कबूल फरमाए! भाई धर्मेंद्र ज़ी! बहुत बहुत ही सुन्दर गजल हुयी है.

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