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निराशा ने घेरा..

 

 

 

निराशा ने घेरा..

 

निशा का समय है दिशा में अँधेरा,

अज्ञानता में बसाया है डेरा.

चलता हुआ ठोकरें खा रहा है,

रोना जहाँ पर वहीँ गा रहा है.

न पहचान आयी की क्या क्या गवाई,

फिसल कर गिरा है पड़ा गहरी खाई .

अमृत गया अब जहर चाटता है.

जहर ही नगर व शहर बाटता है.

बदहोश है और फिर भी मगन है,

नहीं सोचता आग में ही चमन है.

भाई से भाई फूट लाई,

नहीं प्यार की डोर में बाँध पाई.

गयी एकता तो बढ़ी है तबाही,

खुद गर्ज ने फ़र्ज़ ही तो निबाही .

कठिन हलचलों में किसे होश आये,

जहों होश था भी वहीँ रोष छाये.

जहाँ रोशनी है वहीँ है अँधेरा ,

आशा नहीं है निराशा ने घेरा .

धिक्कार उसको जो दीपक जला है,

भीतर अन्धेरा ऊपर भला है.

---रामेश्वर नाथ तिवारी

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Comment

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Comment by Deepak Sharma Kuluvi on March 28, 2011 at 10:16am
TIWARI JI

JAHAN ROSHNI HAI WAHIN HAI ANDHERA....BAHUT KHOOB SIR
REGARDS
DEEPAK KULUVI
Comment by Abhinav Arun on March 27, 2011 at 1:48pm

तिवारी जी प्रभावशाली रचना के लिये बधाई स्वीकारें | आपकी कविता जीवन की सच्चाई और यथार्थ के धरातल का आईना है |

Comment by Tapan Dubey on March 26, 2011 at 5:16pm
अच्छी रचना बधाई

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