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ग़ज़ल - खबर बन गयी

२१२ २१२ २१२ २१२

ज़िंदगी किस कदर इक सफ़र बन गयी

अनलिखी ये कहानी खबर बन गयी

 

बात छोटी सही सबके मुह जो चढ़ी

बात खींची गयी फिर रबर बन गयी

 

राह चलते हुये बज उठी सीटियाँ

सादगी कामिनी की ज़हर बन गयी

 

बेवफाई मिली आग दिल में जली

बेअदब आज मेरी नज़र बन गयी

 

चाह हमने रखी रोशनी की अगर

आरज़ू ही हमारी कबर बन गयी

 

ईश्क की इक नज़र कैद में जो मिली

हथकड़ी टूटकर इक तबर बन गयी

निधि 

 (मौलिक और अप्रकाशित) 

तबर : कुल्हाड़ी के ऊपर का हिस्सा जो चीजों को काटता है 

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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 23, 2015 at 8:37pm

चाह हमने रखी रोशनी की अगर

आरज़ू ही हमारी कबर बन गयी

बहुत ख़ूब! ढेरों बधाईयां!

Comment by somesh kumar on March 23, 2015 at 8:27pm

बात छोटी सही सबके मुह जो चढ़ी

बात खींची गयी फिर रबर बन गयी

थोड़े में ज़्यादा कहना इस कला में आप भी निखर रहीं हैं |सुंदर अभिव्यक्ति 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 23, 2015 at 4:32pm
आदरणीया निधि जी बहुत सुन्दर और बेहतरीन ग़ज़ल हुई है। बह्र को ख़ूबसूरती से निभाया है आपने। इसके लिए बधाई।
कबर और ज़हर इन दो काफ़िया पर थोड़ा शंका है। सुधिजन क्या कहते है उनकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करें।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 23, 2015 at 2:30pm

बढ़िया गजल आ० निधि जी .

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