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ग़ज़ल -- चूल्हे वाली गुड़ की चाय लुभाती है ( गिरिराज भंडारी )

चूल्हे वाली गुड़ की चाय लुभाती है

22  22  22  22   22  2

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याद मुझे वो अक्सर ही आ जाती है

चूल्हे वाली गुड़ की चाय लुभाती है

 

आग चढ़ी वो दूध भरी काली मटकी

वो मिठास अब कहाँ कहीं मिल पाती है 

 

वो कुतिया जो संग आती थी खेतों तक

उसके हिस्से की रोटी बच जाती है

 

छुपा छुपव्वल वाली वो गलियाँ सँकरीं

दिल की धड़कन , यादों से बढ़ जाती है

 

डंडा पचरंगा खेले जिस बरगद में

ख़्वाबों में उसकी डाली आ जाती है 

  

शाला की मेरी कुर्सी वो टूटी सी   

कलम पट्टियाँ ले कर मुझे बुलाती है

 

ज़िन्दा रखना गाँव सदा अपने अन्दर

खुश्बू अमराई की आ समझाती है

 

धुयें धूल से भरी सड़क से पूछूँगा

क्या गाँवों की पगडंडी तक जाती है

***********************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 8, 2015 at 5:43pm

आदरणीय शिज्जु भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका हृदय से आभारी हूँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 8, 2015 at 5:22pm

आदरणीय गिरिराज सर पुरअसर ग़ज़ल कही है आपने हर शेर लाजवाब है बहुत बहुत बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 8, 2015 at 4:47pm

आदरणीय समर कबीर भाई , आपकी सराहना ने मेरी ग़ज़ल मुकम्मल कर दी , आदरणीय, हौसला अफज़ाई के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥

Comment by Samar kabeer on April 8, 2015 at 4:22pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी,आदाब,तारीफ़ के लिये अलफ़ाज़ नहीं है मेरे पास,इतनी अच्छी,इतनी सुन्दर, मुकम्मल,लाजवाब ग़ज़ल के लिये शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 7, 2015 at 11:28am

आदरणीय धर्मेन्द्र भाई , आपकी सराहना ने मेरी मेहनत सफल कर दी ॥ हौसला अफज़ाई का शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 7, 2015 at 11:27am

आदरणीय कृष्णा भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 7, 2015 at 11:26am

आदरणीया प्रतिभा जी , गज़ल की सराहना के लिये आपका शुक्रिया !!

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 7, 2015 at 10:01am

आदरणीय गिरिराज जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है। दाद कुबूल कीजिए

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 7, 2015 at 9:42am

लाजव़ाब रचना आदरणीय!अभिनन्दन!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 7, 2015 at 6:38am

आदरणीय विजय  भाई , ग़ज़ल की सरहना के लिये आपका हार्दिक आभार ॥

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