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रे पथिक, रुक जा! ठहर जा!....................एक गीत (डॉ० प्राची)

रे पथिक, रुक जा! ठहर जा! आज कर कुछ आकलन

बाँच गठरी कर्म की औ’ झाँक अपना संचयन

 

हैं यहाँ साथी बहुत जो संग में तेरे चले

स्वप्न बन सुन्दर सलोने कोर में दृग की पले,

प्रीतिमय उल्लास ले सम्बन्ध संजोता रहा  

या कपट,छल,तंज से निर्मल हृदय तूने छले ?

 

ऊर्ध्वरेता बन चला क्या मुस्कुराहट बाँटता ?

छोड़ आया ग्रंथियों में या सिसकता सा रुदन ?.......रे पथिक..

 

कर्मपथ होता कठिन, तप साधता क्या तू रहा ?

या नियतिवश संग लहरों के सदा बेबस बहा ?

लक्ष्यहित उन्मुख हृदय नें राह शुचिकर ही चुनी,

या उसूलों से डिगा मन लोभवश पल में ढहा ?

 

वासना के जाल में आबद्ध हर इक श्वास से, 

बावरे लिख तो नहीं डाला कहीं अपना पतन ?.......रे पथिक..

 

संतुलन का खेल केवल यह जगत व्यवहार है,

साध लें तो नव-सृजन वरना कुटिल संघार है,

मनस वाचन कर्म में हो ऐक्य, निश्छल भावना-

सूत्र सद्आधार सम देता सदा विस्तार है..

 

बन्धनों से रुद्ध प्रतिपल क्यों रहे आवागमन ?

मुक्ति के उच्छ्वास से चल आज लिख ले उन्नयन...... रे पथिक..

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by मिथिलेश वामनकर on May 1, 2015 at 5:36pm
आदरणीय सौरभ सर की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है इस गीत पर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 1, 2015 at 5:32pm
आदरणीया डॉ प्राची सिंह जी
नमन इस सुन्दर गीत पर।
फ़ाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन
इस गीत की लय किसी प्रार्थना सी हो गई और गुनगुनाते हुए या कहूँ गाते हुए झूम रहा हूँ। आपने ईश्वर से भेंट कराडीदी ।परमपिता से मिलकर झूम गया इस आनंद पे मुग्ध हूँ। इस प्रस्तुति के लिए कोटिशः नमन।

रचना प्रस्तुति में अंतरा बार बार लिखने की बजाय
रे पथिक की टेक भर हो तो प्रस्तुति और अच्छी लगेगी।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 1, 2015 at 10:55am

आदरणीया प्राची जी , स्व की खोज में ( साधना मे ) जाने के पहले की की जाने वाली पूरी तैयारी आपने इस गीत के माध्यम से करा दी है , क्या बात है , पूरी किताब चंद लाइनों में आ गई है ॥ हार्दिक बधाइयाँ और साधुवाद इस गीत के लिये ॥

वासना के जाल में आबद्ध हर इक श्वास से, 

बावरे लिख तो नहीं डाला कहीं अपना पतन ?   -- ये दो लाइनें भुलाये नहीं भूलेंगी ॥

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 30, 2015 at 10:48pm

आदरणीया प्राची जी ..बेहतरीन दिमाग को नया चिंतन देता गीत ,,इस गीत को बार पढ़ा अच्छा लगा ..ये गीत यदि रचना के रचनाकार से किसी मंच पर सुनने को मिले तो ये वाकई श्रोताओं को बरबस ही बाँधने का दमखम रखता है ..आपको इस सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर

Comment by rajkumarahuja on April 30, 2015 at 2:09pm

 ऐ पथिक रुक जा, ठहर जा,आज कर कुछ आंकलन ,बाँच गठरी कर्म की ...........!   बहुत ही भावपूर्ण पंक्तियाँ   !  सुन्दर रचना हेतु  साधुवाद ,माननीया डा. प्राची सिंह जी ! 

Comment by vijay nikore on April 30, 2015 at 10:45am

आपका गीत मानव को आत्मलीन्ता से अन्तर्निरीक्षणात्मक बनने को प्रेरित ही नहीं करता,

साधन और मार्ग की ओर संकेत भी करता है। हार्दिक बधाई।

Comment by umesh katara on April 30, 2015 at 7:47am

वाह वाह बहुत अच्छी रचना मंच को देने के लिये बधाई 

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 30, 2015 at 3:35am

सुंदर भाव ....सुंदर रचना ...सादर 

रे पथिक, रुक जा! ठहर जा! आज कर कुछ आकलन

बाँच गठरी कर्म की औ’ झाँक अपना संचयन

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 29, 2015 at 8:09pm

आ० प्राची जी

आप सदैव मनोरम गीत लिखती हैं i यह गीत भी अप्रतिम है  i  मुझे 'आँकलन'  शब्द सही नहीं लग रहा  i यह आकलन होना चाहिये iआँकना  एक अलग शब्द है i आकलन उससे बिलकुल अलग है i दूसरा 'संघार ' की जगह 'सहार'  सही होगा i सम्भवतः टाइप त्रुटि  हो . सादर .

Comment by Samar kabeer on April 29, 2015 at 6:09pm
मोहतरमा डॉ.प्राची जी,आदाब,सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें |

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