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बार बार नुमाईश हुई
पर खरीदारों को सामान पसंद नहीं आया
सामान को काट छाँट कर दिखाया
सजा कर सँवारकर दिखाया
पर.......
फिर भी किसी खरीदार को सामान पसंद नहीं आया
बात कुछ और थी
बाजार सामान के साथ उपहार वाला बन गया है
उपहार भी दिये गए
पर खरीदारों की ज़रूरत पूरी नहीं हुई
सामान नोंचा कुचला गया
निचोड़ा गया और जलाया मिटा दिया गया
और फिर
एक खुदगर्ज ने कवि बनने की चाह में
एक मासूम लड़की को सामान कह दिया
'अहसास'



मौलिक और अप्रकाशित

Views: 599

Comment

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Comment by मनोज अहसास on May 6, 2015 at 2:29pm
सभी गुणी ज्ञानी लोगो ने बहुत मन से साथ दिया
आभार
कविता व्याख्या की मोहताज़ हो गयी इसमें मेरा दोष निश्चित हो गया
कभी रूप के कारण
कभी धन के कारण
कभी उच्च निम्न के कारण
जब लड़की के विवाह की समस्या नहीं सुलझती
तब सजाना
सवारना
प्रस्तुतिकरण के नए ढंग
और आखिर में खूब सारा ढेर धन का
बाजार की तरह
जो खरीदारी में योजना चाहता है
फिर प्रताड़ना
शोषण
और जीवन की मुश्किल
कभी कभी समाप्ति
और इसके बाद समाज की पीड़ा को समझने वाला साहित्यकार जब उसमे तथा ऎसे दूसरे विषय मअपने लिए सफलता की संभावना ढूढ़ता है और भावतमक शोषण करता है
फिर ग्लानि को प्राप्त करता है
दुखी होता है




और क्या लिखू
मंच की ज़िमेदार आवाजो की भूमिका का मुझे पुनः इंतज़ार है
कविता को कविता ही रहने देता पर ऎसे ही लिख दिया
क्षमा चाहता हूँ
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 6, 2015 at 9:50am

अश्लीलता आज के दौर में सफलता का पर्याय बन गयी है,हर तरफ इसी का बोलबाला दिखता है,गायक,कवि,टीवी प्रोग्राम,फ़िल्में.गीतकार,गजलकार,सभी सिर्फ पैसे और सोहरत के लिए फूहड़ता के किसी भी स्तर तक जाने को तैयार है....आपने रचना में बहुत ही ज्वलंत मुद्दा उठाया है, आपको मेरी ओर से हार्दिक बधाई!

आ० मिथिलेश सर का इशारा जहाँ तक मैं समझ पा रहा हूँ के..इस ओर है के..रचना के माध्यम से मूलतः जो आप कहना चाह रहे है'

//एक खुदगर्ज ने कवि बनने की चाह में
एक मासूम लड़की को सामान कह दिया//

वह बाकि के संवाद से ठीक तरह से जुड़ नही पा रहा है!!

जैसे काट-छांट,समान के साथ उपहार,खरीदार की जरुरत,और नोचना जलाना कुचलना आदि किस तरह से लेखक के लड़की के सामान कहने से जुड़ रहा है?? आपसी तुक बैठ नही रहा!

आशा है मै अपनी  बात कह पाया हूँ!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 5, 2015 at 9:44am

सार्थ प्रस्तुति आदरणीय मनोज जी. आपका नीचे प्रतिउत्तर पढ़कर आपकी रचना का पूर्ण आंकलन कर पाया हूँ. बहुत-बहुत बधाई प्रस्तुति पर,

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on May 5, 2015 at 7:44am

गहरी चोट समाज की सोच पर लगाते हुए प्रभावी अभिव्यक्ती ....सादर 

Comment by Samar kabeer on May 4, 2015 at 11:50pm
जनाब मनोज कुमार अहसास जी,आदाब,अच्छा लिखते हैं आप,बधाई स्वीकार करें |
Comment by Neeraj Neer on May 4, 2015 at 10:45pm

वाह बहुत सुंदर.... 

Comment by मनोज अहसास on May 4, 2015 at 10:25pm
आदरणीय Dr.Vijai shanker जी नमस्कार आपको प्रणाम करता हूं
सादर धन्यवाद
Comment by मनोज अहसास on May 4, 2015 at 10:14pm
नमस्कार सर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए बहुत उपयोगी है
भाव मेरे वश में नहीं है
शिल्प का मुझे ज्ञान नहीं है
शब्द अपनी सीमा अनुसार मैंने लिख दिए है
औचित्य और आवश्यकता बहुत बड़े विषय है उनका विचार मै आप जैसे गुणी ज्ञानी जनो पर छोड़ देता हूँ
सामाजिक कुरीतियो की गहराई और कवि का उसमे स्वयं का यश ढूढ़ना.....भाव मन में न होते हुए भी सामाजिक संवेदनशील विषयो पर केवल प्रसिद्ध होने की चाह में कविता लिखना......और कभी किसी को इस कर्म से ग्लानि होजाने पर स्वीकार करने का भाव....ये सब मुझ से ये पंक्तिया लिखवा गया
........नया और अनुभवहीन होने के नाते आप क्षमा तो मुझे कर ही सकते है
सादर निवेदन
Comment by Dr. Vijai Shanker on May 4, 2015 at 10:05pm
सारगर्भित प्रस्तुति, सामान के साथ ( फ्री ) क्या है, सारा अर्थ तो उसी में सिमटा है,
बधाई, आदरणीय मनोज कुमार एहसास जी, सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 4, 2015 at 8:48pm
आदरणीय मनोज भाई जी
आपकी इस रचना के औचित्य पर विचार कर रहा हूँ और इसकी आवश्यता पर भी। भाव शब्द और शिल्प किसी भी स्तर पर इस रचना से संतुष्ट नहीं हो सका। शायद आप मुझे स्पष्ट कर सके। सादर।

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