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मेरा अस्तित्व कहाँ है // रवि प्रकाश

एक समन्दर भी है अन्दर
थोड़ा उथला,थोड़ा गहरा
और लहर पे लहर चढ़ी है
पहले भी मालूम था लेकिन-
जब से तेरा नाम लिखा है
धाराएँ कुछ और हो गईं
सभी किनारे छूट गए हैं।
कब सूरज ने दम तोड़ा था
तड़प-तड़प के हिमशिखरों पर
टूटे तारे कौन गली में
आस जगा कर रहे बिखरते
प्रोषितपतिका रात बनी कब
दरके थे तटबंध हृदय के
कब मैंने आलाप किया था
वेदमंत्र सा राग तुम्हारा
कब उतरा मेरे अधरों पे
कुछ भी तो अब याद नहीं है।
वो छोटा सा एक अकेला
पल,जब तुमने मुड़ कर देखा
किसे पता था वर्तमान में
अंकित हो कर रह जाएगा,
भाव भरे वे सब आमंत्रण
जो तुम नयनों से देती हो
ज्यों के त्यों मेरी पलकों पर
महक रहे हैं पाटल जैसे
यही स्वयं से पूछ रहा हूँ-
"रोम-रोम जब गेह तुम्हारा
फिर मेरा अस्तित्व कहाँ है?"
शब्द नहीं सुन पाता लेकिन
मौन तुम्हारा पढ़ लेता हूँ,
यूँ लगता है अब भी जैसे
नहीं देखती सी चितवन से
तुमने मुझको फिर देखा है
मान किया है थोड़ा गुपचुप
किंतु स्वतः ही मान गई हो
फिर विस्मय से देख स्वयं को
लज्जा के घेरों में घिर कर
सिमट रही हो मुस्कानों में।
पलक-पाँवड़े बिछे हुए हैं
मेरी सूनी मधुशाला में
शेष मगर है तेरा आना
यही सोच कर सिहर रहा हूँ-
"अर्पण की आतुरता पाले
बासन्ती बेलों से पावन
युग से उत्कंठित अधरों से
तुम जिस पल मुझको छू लोगी
क्या 'मैं' फिर 'मैं' रह पाऊँगा
आशंकित हूँ किसी तरल सा
शायद गल कर बह जाऊँगा॥"
-मौलिक एवं अप्रकाशित।
-02.05.2015

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Comment by Ravi Prakash on May 15, 2015 at 10:38am
आ॰ सौरभ जी। स्नेह और आशीर्वाद के लिए कोटिश: धन्यवाद । कृपया मार्गदर्शन करते रहें।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 14, 2015 at 11:22pm

अद्भुत ! अद्भुत !! अद्भुत !!!

आपकी प्रस्तुति के लिए हृदय से  बधाइयाँ. हार्दिक शुभकामनाएँ,भाई रवि प्रकाशजी.

एक अरसे बाद आपकी प्रस्तुति से गुजरना भला लगा.

Comment by Ravi Prakash on May 11, 2015 at 10:37am
धन्यवाद तनुजा जी।
Comment by Tanuja Upreti on May 11, 2015 at 10:19am

सुन्दर भावपूर्ण रचना हेतु बधाई

Comment by Ravi Prakash on May 11, 2015 at 10:03am
सराहना तथा उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद आ॰ मिथिलेश जी। आशीर्वाद बनाए रखें॥
Comment by Ravi Prakash on May 11, 2015 at 10:02am
बहुत-बहुत धन्यवाद सुनील जी।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 11, 2015 at 9:24am

आदरणीय रविप्रकाश जी बहुत सुन्दर रचना है 

रचना की गेयता और अंतर्गेयता दोनों पर मुग्ध हूँ. 

इस बेहतरीन प्रस्तुति पर आपको बहुत बहुत बधाई 

Comment by shree suneel on May 10, 2015 at 5:11pm
इस सुन्दर रचना के लिए बधाई आदरणीय रवि प्रकाश जी.
Comment by Ravi Prakash on May 10, 2015 at 1:42pm
आदाब जनाब, और तारीफ़ के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।
Comment by Samar kabeer on May 10, 2015 at 10:38am
जनाब रवि प्रकाश जी ,आदाब ,सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।

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