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हम बड़े हो रहे थे
लेकिन आप हमें
बच्चा ही समझती थीं
और जब हम अकड दिखाते
बात-बेबात बहस करते
तो आप खामोश हमें ताकते रहतीं

हम अपने मन की करते
और आपकी खामोश आँखें करतीं
हमारी सलामती की दुवाएं..


आज आप नहीं हैं
और इस संसार में
हम यूँ फिर रहे हैं
जैसे कोई फल हों
सड़क किनारे पेड़ के
जिसपर हर कोई
आजमाता है पत्थर...

हम बड़े ज़रूर हुए हैं अम्मी
लेकिन ममता की ऊष्मा से
वंचित हैं पूरी तरह
अब हमारे हक में
कौई नही मांगता दुवाएं....

(अप्रकाशित / मौलिक)

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Comment by Saurabh Pandey on May 18, 2015 at 4:59pm

इस भावना-प्रधान आत्मीय प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाइयाँ आदरणीय अनवर सुहैल साहब.

Comment by Mala Jha on May 13, 2015 at 1:49pm
अब हमारे हक़ में कोई नही मांगता दुआएँ!!
बहुत खूब!!
Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on May 12, 2015 at 10:41am

आदरणीय anwar suhail जी सही कहा ....अब हमारे हक में कौई नही मांगता दुवाएं....माँ की परिभाषा एक लाइन में कर दी आपने ....सादर 

Comment by Samar kabeer on May 11, 2015 at 6:28pm
जनाब अनवर सुहैल जी,आदाब,अच्छी प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by मनोज अहसास on May 11, 2015 at 3:43pm
बहुत मार्मिक एवम भाव पूर्ण
सादर बधाई
सर

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