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मैं  यहां  पर  रहूँ  या  वहां  पर  रहूँ

ऐ  खुदा  तू  बता  मैं  कहां  पर रहूँ ?

 

एक  साया   मुझे  आपका   जो  मिले

फ़िक्र क्या फिर कहाँ किस मकां पर रहूँ I

 

जिन्दगी  आज  तो  है  तिजारत हुयी   

फर्क ये है कि  मैं किस  दुकां  पर रहूँ I

 

हो  रहम  मालिकों  की मयस्सर मुझे 

पंचवक्ता  तेरी   मैं   अजां  पर  रहूँ I

 

याद   तेरी  करूं  जिन्दगी  यूँ  कटे

नाम  लेता   रहूँ  मैं  जहां  पर  रहूँ I

(मौलिक व् अप्रकाशित )

 

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 4, 2015 at 5:29pm

आ० महर्षि जी

आपका आभार .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 3, 2015 at 10:25pm

प्रिय कृष्णा

आभार  .

Comment by maharshi tripathi on June 3, 2015 at 10:25pm

हो  रहम  मालिकों  की मयस्सर मुझे 

पंचवक्ता  तेरी   मैं   अजां  पर  रहूँ I,,,,,,,,,,,बहुत सुन्दर  प्रणाम आपको आ. डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी |

Comment by jaan' gorakhpuri on June 3, 2015 at 10:08pm
बहुत सुन्दर गजल हुयी है आ० गोपाल नरायन सर!हार्दिक बधाई!सादर
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 2, 2015 at 10:03pm

आ० सुनील जी

आभार प्रकट करता हूँ .

Comment by shree suneel on June 2, 2015 at 9:26pm
एक साया मुझे आपका जो मिले
फ़िक्र क्या फिर कहाँ किस मकां पर रहूँ I.. ख़ूब. ..
अच्छी प्रस्तुति सर जी.
बधाइयां आपको
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 2, 2015 at 9:16pm

ARE VIJAY SIR

I MISSED YOU SO MUCH . AR E YOU O.K.?

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 2, 2015 at 8:09pm

जिन्दगी आज तो है तिजारत हुयी
फर्क ये है कि मैं किस दुकां पर रहूँ I
बहुत खूब , बधाई, आदरणीय डॉ o गोपाल नारायण जी, सादर।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 2, 2015 at 6:28pm

मनोज कुमार जी

अनुगृहीत हुआ '

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 2, 2015 at 6:27pm

आ० सौरभ जी

सादर अभिनन्दन

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